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(प्राण महिमा से प्रतिलिपि→‎वेदों में प्राण)
(प्रतिलिपित→‎वेदों में प्राण)
 
अर्थात्- यह सारा जगत प्राण से आदृत है।
 
===== [[उपनिषद्|उपनिषदों]] में =====
उपनिषदकार का कथन है-
 
प्राणोवा ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। - छान्दोग्य
 
अर्थात्- प्राण ही बड़ा है। प्राण ही श्रेष्ठ है।
 
प्रश्नोपनिषद में प्राणतत्व का अधिक विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है-
 
स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नाद्धीर्य तपोमंत्राः कर्मलोकालोकेषु च नाम च। -प्रश्नोपनिषद् 6।4
 
अर्थात्- परमात्मा ने सबसे प्रथम प्राण की रचना की। इसके बाद श्रद्धा उत्पन्न की। तब आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी यह पाँच तत्व बनाये। इसके उपरान्त क्रमशः मन, इन्द्रिय, समूह, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, और कर्मों का निर्माण हुआ। तदन्तर विभिन्न लोक बने।
 
== सन्दर्भ ==