"विकिपीडिया:पुनरीक्षक पद हेतु निवेदन" के अवतरणों में अंतर

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::::{{सुनो|SM7|NehalDaveND|अनुनाद सिंह}} जी, सभी से निवेदन है कि एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाये बिना अपनी बातें कहें क्योंकि वर्तमान चर्चाएँ शिष्टाचार नीति का स्पष्ट उल्लंघन है।--[[सदस्य:Godric ki Kothri|<span style= "color:#00FFFF"> ''गॉड्रिक की कोठरी''</span>]]<sup>[[सदस्य वार्ता:Godric ki Kothri|<span style= "color:#00FF00">मुझसे बातचीत करें</span>]]</sup> 11:44, 18 सितंबर 2018 (UTC)
::::::[[सदस्य:Godric ki Kothri|गॉड्रिक जी]] टिप्पणी तो मैंने इसी नीयत से लिखा था कि इधर-उधर की बातें न की जाएँ। पर चोर की दाढ़ी में तिनका देखिये, मैं जिस कार्य को करने से मना कर रहा उसका नाम सुनते ही इन्हें लग गया कि इनपे आरोप लगाया जा रहा। खैर... मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। अनुनाद जी को उत्तर उनके वार्ता पन्ने पर लिख दूँगा क्योंकि उनका प्रश्न नितांत अलग क़िस्म का है। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--बातचीत--</small>]]</sup> 13:06, 18 सितंबर 2018 (UTC)
बौद्धिक गतिविधियों सें संलग्न समाज में वार्ता का ये स्तर ? यह कदापि शोभनीय नहीं है। असहमति को भी सम्मान और जगह मिलनी चाहिए। सामने वैचारिक चुनौती नहीं तो फिर क्या लिखना और क्या पढ़ना..? सभी अपनी शैली और भाषा में लिखें इसमें क्या समस्या है? लेकिन दूसरे के लेखन पर लीपापोती करना, अनावश्यक काट-छांट करना, रद्दोबदल करना भी तर्कसंगत नहीं। तमाम धातुओं को पिघलाकर एक मिश्रधातु बना देने के आग्रह से कहीं अच्छा है कि विविधता बनी रहे। "हम ही हम हैं तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो"...बाकी होगा तो वही जो यहां का साधु समाज चाहेगा। सादर--'''[[User:कलमकार|<span style="background: #f40444; color:white;padding:2px;">कलमकार</span>]] [[User talk:कलमकार|<span style="background: #1804f4; color:white; padding:2px;">वार्ता</span>]]''' 18:15, 18 सितंबर 2018 (UTC)
:[[सदस्य:Godric ki Kothri|गॉड्रिक जी]] ये चोर सर्वदा एक नीति पर चलता है, स्वयं के मन में चोर है, परन्तु उस चोर को छुपाने के लिये दूसरो पर मढ़ देता है। आरम्भ इन्होंने किया फिर मैंने उसी भाषा में प्रत्युत्तर दिया। इतने वर्षों से मैं पुनरीक्षण कार्य करते आ रहा हूँ, तब कुछ नहीं था परन्तु उनकी मनशा पूर्ण न हुई तो मैं अयोग्य हो गया। सब विवाद इनके और पीयूष जी द्वारा आरम्भ होते हैं और परिणाम ये निकलता है कि, हिन्दी विस्तृत है और उस में शब्दों, अङ्कों, पञ्चमाक्षरों के सन्दर्भ में सब को अपनी अपनी शैली में प्रयोग करने दो। फिर भी कुछ दिनों के पश्चात् ये पुनः कुछ ऐसा करेंगे, जिससे विवाद हो और कलङ्क सामने वाले पर लगता है।
# समुदाय में सब का मत है कि, मात्र शब्दों और अङ्कों के परिवर्तन के लिये सम्पादन जो भी करेगा वो स्वीकार्य नहीं होगा। इस में संस्कृतनिष्ठ शब्द से फारसी इत्यादि करना हो या इसके विपरीत। अङ्कों का देवनागरी से अरबी करना हो या इसके विपरीत। वो सब एक सामन दण्ड के अधिकरी हैं।