"अनुवाद" के अवतरणों में अंतर

29,305 बैट्स् जोड़े गए ,  3 वर्ष पहले
प्रक्रिया
(प्रक्रिया)
 
अनुवाद प्रक्रिया के इस निरूपण से सैद्धान्तिक स्तर पर दो बातों का स्पष्टीकरण होता है । एक, मूलभाषापाठ के अनुवादकीय बोध से निष्पन्न वैचारिक संरचना ही क्योंकि लक्ष्यभाषापाठ का रूप ग्रहण करती है, अतः अनुवादक भेद से अनुवाद भेद दिखाई पड़ता है । दूसरे, उपर्युक्त वैचारिक संरचना विशिष्ट भाषा निरपेक्ष (या उभय भाषा सापेक्ष) होती है - उसमें दोनों भाषाओं (मूल तथा लक्ष्य) के माध्यम से यथासम्भव समान तथा निकटतम रूप में अभिव्यक्त होने की संभाव्यता होती है । मूलभाषापाठ का सन्देश जो अनूदित हो जाता है उसकी यह व्याख्या है ।
 
== अनुवाद प्रक्रिया की प्रकृति ==
अनुवाद प्रक्रिया के उपर्युक्त विवरण के आधार पर अनुवाद प्रक्रिया की प्रकृति के परस्पर सम्बद्ध तीन मूलतत्त्व निर्धारित किए जाते हैं : '''सममूल्यता, द्वन्द्वात्मकता, और अनुवाद परिवृत्ति'''।
 
=== सममूल्यता ===
अनुवाद कार्य में अनुवादक मूलभाषापाठ के लक्ष्यभाषागत पर्यायों से जिस समानता की बात करता है, वह मूल्य (वैल्यू) की दृष्टि से होती है । यह मूल्य का तत्त्व भाषा के शब्दार्थ तथा व्याकरण के तथ्यों तक सीमित नहीं होता, अपितु प्रायः उनसे कुछ अधिक तथा भाषाप्रयोग के सन्दर्भ से (आन्तरिक और बाह्य दोनों) से उद्भूत होता है । वस्तुतः यह एक पाठसंकेतवैज्ञानिक संकल्पना है तथा सन्देश स्तर की समानता से जुड़ी है । भाषा के भाषावैज्ञानिक विश्लेषण में अर्थ के स्तर पर पर्यायत्ता या अन्ययांतर सम्बन्ध पर आधारित होते हुए भी सममूल्यता सन्देश का गुण है, जिसमें पाठ का उसकी समग्रता में ग्रहण होता है । यह अवश्य है कि सममूल्यता के निर्धारण में पाठसङ्केतविज्ञान के तीन घटकों के अधिक्रम का योगदान रहता है - वाक्यस्तरीय सममूल्यता पर अर्थस्तरीय सममूल्यता को प्राधान्य मिलता है तथा अर्थस्तरीय सममूल्यता पर सन्दर्भस्तरीय सममूल्यता को मान्यता दी जाती है । दूसरे शब्दों में, यदि दोनों भाषाओं में वाक्यरचना के स्तर पर सममूल्यता स्थापित न हो तो अर्थस्तरीय सममूल्यता निर्धारित करनी होगी, और यदि अर्थस्तरीय सममूल्यता निर्धारित न हो सके, तो सन्दर्भस्तरीय सममूल्यता को मान्यता देनी होगी । उदाहरण के लिए, The meeting was chaired by X" (कर्मवाच्य) के हिन्दी अनुवाद “क्ष ने बैठक की अध्यक्षता की" (कर्तृवाच्य) में सममूल्यता का निर्धारण वाक्य स्तर से ऊपर अर्थ स्तर पर हुआ है, क्योंकि दोनों की वाक्यरचनाओं में वाच्य की दृष्टि से असमानता है । इसी प्रकार, What time is it? के हिन्दी अनुवाद 'कितने बजे हैं ?' (न कि समय क्या है जो हिन्दी का सहज प्रयोग न होकर अंग्रेजी का शाब्दिक अनुवाद ही अधिक प्रतीत होता है) के बीच सममूल्यता का निर्धारण अर्थस्तर से ऊपर सन्दर्भ - समय पूछना, जो एक दैनिक सामाजिक व्यवहार का सन्दर्भ है - के स्तर पर हुआ है । इस प्रकार सममूल्यता की स्थिति पाठसङ्केत के सङ्घटनात्मक पक्ष में होने के साथ-साथ सम्प्रेषणात्मक पक्ष में भी होती है, जिसमें सम्प्रेषणात्मक पक्ष का स्थान संघटनात्मक पक्ष से ऊपर होता है ।
 
सममूल्यता को पाठसंकेतवैज्ञानिक संकल्पना मानने से व्यवहार में जो छूट मिलती है, वह सम्प्रेषण की मान्यता पर आधारित अनुवाद कार्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है । मूलभाषा का पाठ किस भाषाभेद (प्रयुक्ति) से सम्बन्धित है, उसका उद्दिष्ट/सम्भावित पाठक कौन है (उसका शैक्षिक-सांस्कृतिक स्तर क्या है), अनुवाद करने का उद्देश्य क्या है - इन तथ्यों के आधार पर अनुवाद सममूल्यों का निर्धारण होता है । इस प्रक्रिया में वे यदि कभी शब्दार्थगत पर्यायों तथा गठनात्मक संरचनाओं की सम्वादिता से कभी-कभी भिन्न हो सकते हैं, तो कुछ प्रसंगों में उनसे अभिन्न, अत एव तद्रूप होने की सम्भावना को नकारा भी नहीं किया जा सकता । यह ठीक है कि भाषाएँ संरचना, शैलीय प्रतिमान आदि की दृष्टि से अंशतः असमान होती हैं और यह भी ठीक है कि वे अंशतः समान भी होती हैं; मुख्य बात यह है कि उन समान तथा असमान बिन्दुओं को पहचाना जाए । सम्प्रेषण के सन्दर्भ में समानता एक लचीली स्थिति बन जाती है । अनुवाद में मूल्यगत समानता ही उपलब्ध करनी होती है । अनुवादगत सममूल्यता लक्ष्य भाषापाठ की दृष्टि से यथासम्भव स्वाभाविक तथा मूलभाषापाठ के यथासम्भव निकटतम होती है । इसका एक उल्लेखनीय गुण है। गत्यात्मकता, जिसका तात्पर्य यह है कि अनुवाद के पाठक की अनुवाद सममूल्यों के प्रति वही स्वीकार्यता है जो मूल के पाठकों की मूल की सम्बद्ध अभिव्यक्तियों के प्रति है । स्वीकार्यता या प्रतिक्रिया की यह समानता उभयपक्षीय होने से गतिशील है, और यही अनुवाद सममूल्यता की गत्यात्मकता है ।
 
=== द्वन्द्वात्मकता ===
अनुवाद का सम्बन्ध दो स्थितियों के साथ है । इसे अनुवादक द्वन्द्वात्मकता कहेते हैं। यह द्वन्द्वात्मकता केवल भाषा के आयाम तक सीमित नहीं, अपितु समस्त अनुवाद परिस्थिति में व्याप्त है । इसकी मूल विशेषता है सन्तुलन, सामंजस्य या समझौता । एक प्रक्रिया, सम्बन्ध, और निष्पत्ति के रूप में अनुवाद की द्वन्द्वात्मकता के विभिन्न आयामों को इस प्रकार निरूपित किया जाता है :
 
==== (क) अनुवाद का बाह्य सन्दर्भ ====
१. अनुवाद में, मूल लेखक तथा दूसरे पाठक (अनुवाद का पाठक) के बीच सम्पर्क स्थापित होता है । मूल लेखक और दूसरे पाठक के बीच देश या काल या दोनों की दृष्टि से दूरी या निकटता से द्वन्द्वात्मकता के स्वरूप में अन्तर आता है । स्थान की दृष्टि से मूल लेखक तथा पाठक दोनों ही विदेशी हो सकते हैं, स्वदेशी हो सकते हैं, या इनमें से एक विदेशी और एक स्वदेशी हो सकता है । काल की दृष्टि से दोनों अतीतकालीन हो सकते हैं, दोनों समकालीन हो सकते हैं, या लेखक अतीत का और पाठक समसामयिक हो सकता है । इन सब स्थितियों से अनुवाद प्रक्रिया प्रभावित होती है।
 
२. अनुवाद में, मूल लेखक और अनुवादक में सन्तुलन अपेक्षित होता है । अनुवादक को मूल लेखक की चिन्तन पद्धति और अभिव्यक्ति पद्धति के साथ अपनी चिन्तन पद्धति तथा अभिव्यक्ति पद्धति का सामञ्जस्य स्थापित करना होता है।
 
३. अनुवाद में, अनुवादक तथा अनुवाद के पाठक के मध्य अनुबन्ध होता है । अनुवादक का अनुवाद करने का उद्देश्य वही हो जो अनुवाद के पाठक का अनुवाद पढ़ने के सम्बन्ध में है । अनुवादक के लिए आवश्यक है कि, वह अपने भाषा प्रयोग को अनुवाद के सम्भावित पाठक की बोधनक्षमता के अनुसार ढाले ।
 
४. अनुवाद में, अनुवादक की व्यक्तिगत रुचि (अनुवाद कार्य तथा अनुवाद सामग्री दोनों की दृष्टि से) तथा उसकी व्यावसायिक आवश्यकता का समन्वय अपेक्षित है ।
 
५. अपनी प्रकृति की दृष्टि से पूर्ण अनुवाद असम्भव है तथा अनूदित रचना मूल रचना के पूर्णतया समान नहीं हो सकती, परन्तु सामाजिक-सांस्कृतिक तथा राजनीतिक-आर्थिक दृष्टि से अनुवाद कार्य न केवल महत्त्वपूर्ण है अपितु आवश्यक और सुसंगत भी । एक सफल अनुवाद में उक्त दोनों स्थितियों का सन्तुलन होता है।
 
==== (ख) अनुवाद का आन्तरिक सन्दर्भ ====
६. अनुवाद में, दो भाषाओं के मध्य सम्बन्ध के परिप्रेक्ष्य में, एक और भाषा-संरचना (सन्दर्भरहित) तथा भाषा-प्रयोग (सन्दर्भसहित) के मध्य द्वन्दात्मक सम्बन्ध स्पष्ट होता है, तो दूसरी ओर भाषा-प्रयोग के सामान्य पक्ष और विशिष्ट पक्ष के मध्य सन्तुलन की स्थिति उभरकर सामने आती है ।
 
७. अनुवाद में, दो भाषाओं की विशिष्ट प्रयुक्तियों के दो विशिष्ट पाठों के मध्य विभिन्न स्तरों और आयामों पर समायोजन अपेक्षित होता है । ये स्तर/आयाम हैं - व्याकरणिक गठन, शब्दकोश के स्तर, शब्दक्रम की व्यवस्था, सहप्रयोग, शब्दार्थ, व्यवस्था, भाषाशैली की रूढ़ियाँ, भाषा-प्रकार्य, पाठ प्रकार, साहित्यिक सामाजिक-सांस्कृतिक रूढ़ियाँ ।
 
८. गुणात्मक दृष्टि से अनुवाद में विविध प्रकार के सन्तुलन दिखाई देते हैं। किसी भी पाठ का सब स्तरों/आयामों पर पूर्ण अनुवाद असम्भव है, परन्तु सब प्रकार के पाठों का अनुवाद सम्भव है । एक सफल अनुवाद में निम्नलिखित युग्मों के घटक सन्तुलन की स्थिति में दिखाई देते हैं - विशुद्धता और सम्प्रेषणीयता, रूपनिष्ठता और प्रकार्यात्मकता, शाब्दिकता और स्वतन्त्रता, मूलनिष्ठता और सुन्दरता (रोचकता), और उद्रिक्तता तथा सामासिकता । तदनुसार एक सफल अनुवाद जितना सम्भव हो, उतना विशुद्ध, रूपनिष्ठ, शाब्दिक, और मूलनिष्ठ होता है तथा जितना आवश्यक हो उतना सम्प्रेषणीय प्रकार्यात्मक, स्वतन्त्र, और सुन्दर (रोचक) होता है । इसी प्रकार एक सफल अनुवाद में उद्रिक्तता (सूचना की दृष्टि से मूलपाठ की अपेक्षा लम्बा होना) की प्रवृत्ति है, परन्तु लक्ष्यभाषा प्रयोग के कौशल की दृष्टि से उसका संक्षिप्त होना वाञ्छित होता है।
 
९. कार्यप्रणाली की दृष्टि से, क्षतिपूर्ति के नियम के अनुसार अनुवाद में मुख्यतया निम्नलिखित युग्मों के घटकों में सह-अस्तित्व दिखाई देता है : छूटना-जुड़ना (सूचना के स्तर पर) और आलंकारिकता-सुबोधता (अभिव्यक्ति के स्तर पर) । लक्ष्यभाषा में व्यक्त सन्देश के सौष्ठवपूर्ण पुनर्गठन के लिए मूल पाठ में से कुछ छूटना तथा लक्ष्यभाषा पाठ में कुछ जुड़ना अवश्यम्भावी है । यदि कुछ छूटेगा तो कुछ जुड़ेगा भी; विशेष बात यह है कि न छूटने लायक यथासम्भव छूटे नहीं तथा न जुड़ने लायक जुड़े नहीं । मूलपाठ की कुछ आलंकारिक अभिव्यक्तियाँ, जैसे रूपक, अनुवाद में जब लक्ष्यभाषा में संक्रान्त नहीं हो पातीं तो अनलंकृत अभिव्यक्तियों का प्रयोग करना होता है - अलंकार की प्रभावोत्पादकता का स्थान सामान्य कथन की सुबोधता ले लेती है । यही बात विपरीत ढंग से भी हो सकती है - मूल की सुबोध अभिव्यक्ति के लिए लक्ष्यभाषा में एक अलंकृत अभिव्यक्ति का चयन कर लिया जाता है, परन्तु वह लक्ष्यभाषा की बहुप्रचलित रूढि हो जो प्रभावोत्पादक होने के साथ-साथ सुबोध भी हो ये अत्यावश्यक होता है।
 
द्वन्द्वात्मकता के विभिन्न आयामों के विवेचन से अनुवादसापेक्ष सम्प्रेषण की प्रकृति पर व्यापक प्रकाश पड़ता है । यह सन्तुलन जितना स्वीकार्य होता है, अनुवाद उतना ही सफल प्रतीत होता है।
 
=== अनुवाद परिवृत्ति ===
अनुवाद कार्य में अनुवाद परिवृत्ति एक अवश्यम्भावी तथा वांछनीय एवं स्वाभाविक स्थिति है । परिवृत्ति से अभिप्राय है दोनों भाषाओं के मध्य विभिन्न स्तरीय सम्वादिता से विचलन । विचलन की दो स्थितियाँ हो सकती हैं - '''अनिवार्य तथा ऐच्छिक''' । अनिवार्य विचलन भाषा की शब्दार्थगत एवं व्याकरणिक संरचना का अन्तरङ्ग है; उदाहरण के लिए [[मराठी]] नपुंसकलिङ्ग संज्ञा [[हिन्दी]] में पुल्लिंग या स्त्रीलिंग संज्ञा के रूप में ही अनूदित होगी । कुछ इसी प्रकार की बात अंग्रेजी वाक्य I have fever के हिन्दी अनुवाद 'मुझे ज्वर है' के लिए कही जा सकती है, क्योंकि 'मैं ज्वर रखता हूँ' हिन्दी में सम्प्रेषणात्मक तथ्य के रूप में स्वीकृत नहीं । ऐच्छिक विचलन में विकल्प की व्यवस्था होती है । अंग्रेजी "The rule states that" को हिन्दी में दो रूपों में कहा जा सकता है - “इस नियम में यह व्यवस्था है कि/ कहा गया है कि " या "यह नियम कहता है कि "। इन दोनों में पहला वाक्य हिन्दी में स्वाभाविक प्रतीत होता है, उतना दूसरा नहीं यद्यपि अब यह भी अधिक प्रचलित माना जाता है । एक उपयुक्त अनुवाद में पहले अनुवाद को प्राथमिकता मिलेगी । अनुवाद के सन्दर्भ में ऐच्छिक विचलन की विशेष प्रासङ्गिकता इस दृष्टि से है कि, इससे अनुवाद को स्वाभाविक बनाने में सहायता मिलती है । अनिवार्य विचलन, तुलनात्मक-व्यतिरेकी भाषा विश्लेषण का एक सामान्य तथ्य है, जिसमें अनुवाद का प्रयोग एक उपकरण के रूप में किया जाता है।
 
==== अनुवाद-परिवृत्ति की संकल्पना ====
अनुवाद-परिवृत्ति की संकल्पना का सम्बन्ध प्रधान रूप से [[व्याकरण]] के साथ माना गया है।<ref>कैटफोर्ड १९६५ : ७३-८२</ref> यह दो रूपों में दिखाई देता है - '''व्याकरणिक शब्दों की परिवृत्ति तथा व्याकरणिक कोटियों की परिवृत्ति''' ।
 
===== व्याकरणिक शब्दों की परिवृत्ति =====
व्याकरणिक शब्दों की परिवृत्ति का एक उदाहरण उपर्युक्त वाक्ययुग्म में दिखाई देता है । अंग्रेजी का निर्धारक या निश्चयत्मक आर्टिकल the हिन्दी में (सार्वनामिक) सङ्केतवाचक विशेषण 'यह/इस' हो गया है, यद्यपि यह अनिवार्य विचलन के अन्तर्गत है ।
 
===== व्याकरणिक कोटियों की परिवृत्ति =====
व्याकरणिक कोटियों की परिवृत्ति में अनुवादक दो भेदों की ओर विशेष ध्यान देते हैं - '''व्याकरणिक कोटियों की परिवृत्ति तथा श्रेणी-परिवृत्ति''' । वाक्य में व्याकरणिक कोटियों की विन्यासक्रमात्मक संरचना में परिवृत्ति का उदाहरण है अंग्रेजी के सकर्मक वाक्य में प्रकार्यात्मक कोटियों के क्रम, [[कर्ता]] + [[क्रिया (व्याकरण)|क्रिया]] + [[कर्म]], का हिन्दी में बदलकर कर्ता + कर्म + क्रिया हो जाना । यह परिवृत्ति के अनिवार्य विचलन के अन्तर्गत है; अतः व्यतिरेक है । श्रेणी परिवृत्ति का प्रसिद्ध उदाहरण है मूलभाषा के पदबन्ध का लक्ष्यभाषा में उपवाक्य हो जाना या उपवाक्य का पदबन्ध हो जाना । अंग्रेजी-हिन्दी अनुवाद में इस प्रकार की परिवृत्ति के उदाहरण प्रायः मिल जाते हैं -भारतीय रेलों में सुरक्षा सम्बन्धी निर्देशावली के अंग्रेजी पाठ का शीर्षक है : "Travel safely" (उपवाक्य) और हिन्दी पाठ का शीर्षक है : ‘सुरक्षा के उपाय' (पदबन्ध), जबकि अंग्रेजी में भी एक पदबन्ध हो सकता है - "Measures of safety." इसी प्रकार पदस्तरीय, विशेषतः समस्त पद के स्तर की, इकाई का एक पदबन्ध के रूप में अनूदित होने के उदाहरण भी प्रायः मिल जाते हैं - अंग्रेज़ी "She is a good natured girl" = "वह अच्छे स्वभाव की लड़की है" ('वह एक सुशील लड़की है' में परिवृत्ति नहीं है) । श्रेणी परिवृत्ति के दोनों उदाहरण ऐच्छिक विचलन के अन्तर्गत हैं । अंग्रेज़ी से हिन्दी के अनुवाद के सन्दर्भ में, विशेषतया प्रशासनिक पाठों के अनुवाद के सन्दर्भ में, पाई जाने वाली प्रमुख अनुवाद परिवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं <ref>सुरेश कुमार : १९८० : २८</ref> :
(१) अं० निर्जीव कर्ता युक्त सकर्मक संरचना = हि० अकर्मकीकृत संरचना :
 
The rule states that = इस नियम में यह व्यवस्था है कि।
 
(२) अं० कर्मवाच्य/कर्तृवाच्य = हि० कर्तृवाच्य/कर्मवाच्य :
 
The meeting was chaired by X = क्ष ने बैठक की अध्यक्षता की।
 
I cannot drink milk now = मुझसे अब दूध नहीं पिया जाएगा ।
 
(३) अं० पूर्वसर्गयुक्त/वर्तमानकालिक कृदन्त पदबन्ध = हि० उपवाक्य :
 
(They are further requested) to issue instructions = (उनसे
 
अनुरोध है कि) वे अनुदेश जारी करें ।
 
(४) अं० उपवाक्य = हि० पदबन्ध :
 
(This may be kept pending) till a decision is taken on the main file = मुख्य मिसिल पर निर्णय होने तक (इसे रोक रखिए)।
 
==सन्दर्भ==
{{reflist}}
 
[[श्रेणी:अनुवाद सिद्धान्त]]
9,894

सम्पादन