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हँसी मनुष्यों की तरह सीमित या विशिष्ट नहीं हो सकती है। चिम्पांजी और मनुष्य की हँसी में भिन्नताएं उन रूपांतरणों का परिणाम हो सकती हैं जो इंसानी बोली के रूप में विकसित हुआ है। दर्पण परीक्षण में देखे गये के अनुसार किसी की स्थिति के बारे में आत्म-जागरूकता या दूसरे की अवस्था के साथ उसकी पहचान करने की क्षमता (देखें मिरर न्युरोंस), हँसी के लिये आवश्यक शर्तें हैं, इसीलिये संभवतः जानवरों के हँसने का तरीका भी मनुष्यों के समान ही होता है।
 
चिम्पांजी, [[गोरिल्ला]] और ओरांगउटान शारीरिक संपर्क जैसे कि कुश्ती, पीछा करने के खेल या गुदगुदी के जवाब में हँसी की तरह के स्वरोच्चारण का प्रदर्शन कर सकते हैं। यह जंगली और कैद में रखे गये चिम्पांजियों के मामले में प्रलेखित है। आम चिम्पांजी की हँसी को मनुष्यों द्वारा आसानी से नहीं पहचाना जा सकता है क्योंकि यह साँस लेने और छोड़ने की वैकल्पिक क्रियाओं से उत्पन्न होती है जिसकी आवाज काफ़ी हद तक साँस लेने या हाँफने जैसी होती है। कई ऐसे उदाहरण हैं जिनमें गैर-मानव प्रजातियों को खुशी जाहिर करते दिखाया गया है। एक अध्ययन में मानव शिशु और बोनोबोज के गुदगुदी करने पर निकाले गये आवाजों का विश्लेषण किया गया और इन्हें रिकार्ड किया गया है। ऐसा देखा गया है कि हालांकि बोनोबो की हँसी उच्च आवृत्ति की थी, इस हँसी में मानव शिशुओं के समान हँसी के तरीके का अनुसरण किया गया था और इसमें चेहरे के भाव भी उसी तरह के थे। मनुष्य और चिम्पांजी के शरीर में एक जैसी जगहों पर गुदगुदी होती है जैसे कि [[काँख]] और पेट. चिम्पांजियों में गुदगुदी का आनंद उम्र के साथ कम नहीं होता है।<ref name="Discover2003">{{Cite journal|author=Steven Johnson | date=2003-04-01|title=Emotions and the Brain |journal=Discover Magazine|url=http://discovermagazine.com/2003/apr/featlaugh |accessdate= 2007-12-10}}</ref>
{{See also|Laughter in animals}}