"सूक्त" के अवतरणों में अंतर

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{{स्रोतहीन|date= अगस्त 2016}}
 
[[वेद|वेदों]] के [[संहिता]] भाग में [[मंत्र|मंत्रों]] का शुद्ध रूप रहता है जो देवस्तुति एवं विभिन्न [[यज्ञ|यज्ञों]] के समय पढ़ा जाता है। अभिलाषा प्रकट करने वाले मंत्रों तथा गीतों का संग्रह होने से संहिताओं को संग्रह कहा जाता है। इन संहिताओं में अनेक देवताओं से सम्बद्ध '''सूक्त''' प्राप्त होते हैं। वृहद्देवताकार सूक्त की परिभाषा करते हैं-----------हुए "सम्पूर्णमृषिवाक्यं तु सूक्तमित्यsभिधीयते"अर्थात् मन्त्रद्रष्टा ऋषि के सम्पूर्ण वाक्य को सूक्तवृहद्देवताकार कहते हैँ,जिसमेँ एक अथवा अनेक मन्त्रों में देवताओं के नाम दिखलाई पडते हैं। सूक्त के चार भेद:हैं- देवता,ऋषि,छन्द एवं अर्थ।
: ''सम्पूर्णमृषिवाक्यं तु सूक्तमित्यsभिधीयते''
: अर्थात् मन्त्रद्रष्टा ऋषि के सम्पूर्ण वाक्य को सूक्त कहते हैँ, जिसमेँ एक अथवा अनेक मन्त्रों में देवताओं के नाम दिखलाई पड़ते हैैं।
 
सूक्त के चार भेद:- देवता, ऋषि, छन्द एवं अर्थ।
 
==अग्नि सूक्त==