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|title=अनोखा आकर्षण - आम्बेर|accessmonthday= |accessdate= ०६ फ़रवरी २०१८|accessmonthday= |accessdaymonth = |accessyear= |author= |last= कटरपंच |first= महेश |authorlink= |coauthors= |date= |year= |month= |format= |work= |publisher= अभिव्यक्ति |pages= |language= |archiveurl= |archivedate= |quote= }}</ref>
 
वैसे टॉड एवं कन्निंघम, दोनों ने ही अम्बिकेश्वर नामक शिव स्वरूप से इसका नाम व्युत्पन्न माना है। यह अम्बिकेश्वर शिव मूर्ति पुरानी नगरी के मध्य स्थित एक कुण्ड के समीप स्थित है। राजपूताना इतिहास में इसे कभी पुरातनकाल में बहुत से आम के वृक्ष होने के कारण आम्रदाद्री नाम भी मिल था। जगदीश सिंह गहलौत के अनुसार{{cn}} कछवाहों के इतिहास में [[राणा कुम्भ|महाराणा कुम्भकुम्भा]] केकेे समय के अभिलेख आमेर को आम्रदाद्रि नाम से ही सम्बोधित करते हैं।
 
ख्यातों में प्राप्त विवरण के अनुसार दूल्हाराय कछवाहा की सं॰ १०९३ ई॰ में मृत्योपरांत राजा बने के पुत्र अम्बा भक्त राजा कांकिल ने इसे आमेर नाम से सम्बोधित किया है।{{ref|जमुवाय|क}} <ref name="भारत" /><ref>{{cite web|url=https://shabd.in/post/21747/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be%22|title=कच्छावा राजवंश की कुलदेवी "जमवाय माता"|accessmonthday=|accessdate= १२ मार्च, २०१८|last="मणकसास"|first=भोजराज सिंह शेखावत|authorlink=|coauthors=|date=२५ अक्तूबर २०१५|year=|month=|format=|work=|publisher=|pages=|language=|archiveurl=|archivedate=|quote=}}</ref>
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