"दशहरा" के अवतरणों में अंतर

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'''[[दशहरा]]''' (विजयदशमी या आयुध-पूजा) [[हिन्दु]]ओं का एक प्रमुख [[त्योहार]] है। [[अश्विन]] (क्वार) मास के [[शुक्ल पक्ष]] की [[दशमी]] [[तिथि]] को इसका आयोजन होता है। भगवान [[राम]] ने इसी दिन [[रावण]] का वध किया था। इसे असत्य पर [[सत्य]] की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस [[दशमी]] को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ [[तिथि|तिथियों]] में से एक है, अन्य दो हैं [[चैत्र]] [[शुक्ल]] की एवं [[कार्तिक]] [[शुक्ल]] की [[प्रतिपदा]]। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, [[शस्त्र]]-[[पूजा]] की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा पर निकलते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। '''[[रामलीला]]''' का आयोजन होता है। [[रावण]] का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान [[राम]] की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा [[दुर्गा पूजा]] के रूप में, दोनों ही रूपों में यह [[शक्ति]]-[[पूजा]] का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। [[भारतीय संस्कृति]] वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरेदशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों को- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। <ref name = "विप्र वार्ता">
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इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर भी 'विजयादशमी' कहते हैं। इस दिन भगवान [[राम|रामचंद्र]] चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा [[रावण]] का वध कर [[अयोध्या]] पहुँचे थे। इसलिए भी इस पर्व को 'विजयादशमी' कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि [[आश्विन]] [[शुक्ल]] [[दशमी]] को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक [[मुहूर्त]] होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।
 
ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए। इस दिन [[श्रवण नक्षत्र]] का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं (महत्वपूर्णमहत्त्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोग) को सीमा का उल्लंघन करना चाहिए। [[दुर्योधन]] ने [[पांडव|पांडवों]] को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में [[अर्जुन]] ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा [[विराट]] के पासयहँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए [[विराट]] के पुत्र [[धृष्टद्युम्न]] ने [[अर्जुन]] को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है।
 
==भारत के विभिन्न प्रदेशों का दशहरा==