"बिहार का मध्यकालीन इतिहास" के अवतरणों में अंतर

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== ममलूक वंश ==
बख्तियार खिलजी की मृत्यु (१२०६ ई.) के बाद अलीमर्दन बिहार का कार्यकारी शासक बना। इसके बाद हस्युयद्दीन इवाज खिलजी ने गयासुद्दीन तुगलक (१२०७-२७ ई.) के नाम से लखनौती में स्वतन्त्र सत्ता कायम की और १२११ ई. में हूसामुद्दीन ने गयासुद्दीन की उपाधि धारण की। वह तिरहुत राजा से नजराना वसूला करता था। इसके बाद इजाउद्दीन तुगरील तुगान खान (१२३३-४५ ई.) ने भी तिरहुत पर आक्रमण किया था। दिल्ली में इल्तुतमिश के सुल्तान बनने के बाद उसने बिहार पर विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन १२८५ ई. तक विशाल सएना लेकर बिहार की ओर चल पड़ा, उसने बिहार शरीफ एवं बाढ़ पर अधिकार कर लिया और लखनौती के आगे बढ़ा परन्तु राजमहल की पहाड़ियों में तोलियागढ़ी शासक इवाज की सेना से मुठभेड़ हुई उसने तुरन्त अधीनता स्वीकार कर आत्मसमर्पण कर दिया। इल्तुतमिश ने मालिक अलाउद्दीन जानी को बिहार में दिल्ली के प्रथम प्रतिनिधि के रूप में नियुक्‍त किया, परन्तु शीघ्र ही इवाज ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद [[इल्तुतमिश]] का पुत्र नसीरुद्दीन महमूद अन्त में वहाँ आया। बलबन की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत से बिहार पुनः स्वतन्त्र हो गया।
 
ममलूक राजवंश के समय तुर्कों का मनेर, बिहार शरीफ के अलावा शाहाबाद (गया), पटना, मुंगेर, भागलपुर, नालन्दा, सासाराम एवं विक्रमशिला इत्यादि क्षेत्रों पर अधिकार रहा। परन्तु दक्षिण बिहार में तुर्कों का उतना प्रभाव क्षेत्रों पर अधिकार रहा। परन्तु दक्षिण बिहार में तुर्कों का उतना प्रभाव क्षेत्र नहीं रहा।
रुकनुद्दीन कैकाउस की मृत्यु की बाद बिहार पर लखनौती का नियन्त्रण समाप्त हो गया। फिरोज ऐतगीन ने सुल्तान शमसुद्दीन फिरोजशाह के नाम से एक राजवंश बनाया १३०५-१५ ई. तक हातिम खाँ बिहार का गवर्नर बना रहा।
 
इस प्रकार बिहार पर [[ख़िलजी वंश|खिलजी राजवंशवंश]] का प्रभाव कम और सीमित क्षेत्रों पर रहा। (जो अवध का गवर्नर था) इवाज को गिरफ्तार कर हत्या कर दी। अवध, बिहार और लखनौती को मिलाकर एक कर दिया। १२२७-२९ ई. तक उसने शासन किया। १२२९ ई. में उसकी मृत्यु के बाद दौलतशाह खिलजी ने पुनः विद्रोह कर दिया, परन्तु इल्तुतमिश ने पुनः लखनौती जाकर वल्ख खिलजी को पराजित कर दिया तथा बिहार और बंगाल को पुनः अलग-अलग कर दिया। उसने अलालुद्दीन जानी को बंगाल का गवर्नर एवं सैफूद्दीन ऐबक को बिहार का राज्यपाल नियुक्‍त किया बाद में तुगान खाँ बिहार का राज्यपाल बना। उसके उत्तराधिकारियों में क्रमशः रुकनुद्दीन फिरोजशाह, रजिया मुइज्जुद्दीन, ब्रह्यराय शाह एवं अलाउद्दीन मसूद शाह आदि शासकों ने लखनौती एवं बिहार के तथा दिल्ली के प्रति नाममात्र के सम्बन्ध बनाये रखे।
 
== [[बलबन]] ==
 
== [[तुगलक वंश]] ==
तुगलक वंश की स्थापना [[गयासुद्दीन तुग़लक़|गयासुद्दीन तुगलक]] (गाजी मलिक) ने १३२० ई. में दिल्ली सुल्तान खुसराव खान का अन्त करके की।
 
गयासुद्दीन का अन्तिम सैन्य अभियान बंगाल विजय थी। उसने १३२४ ई. में बंगाल-बिहार के लिए सैन्य अभियान भेजा। लखनौती शासक नसीरुद्दीन ने समर्पण कर दिया परन्तु सोनार गाँव के शासक गयासुद्दीन बहादुर ने विरोध किया, जिसे पराजित कर दिल्ली भेज दिया गया।
तुगलक वंश के समय में ही मुख्य रूप से बिहार पर दिल्ली के सुल्तानों का महत्वपूर्ण वर्चस्व कायम हुआ। गयासुद्दीन तुगलक ने १३२४ ई. में बंगाल अभियान से लौटते समय उत्तर बिहार के कर्नाट वंशीय शासक हरिसिंह देव को पराजित किया। इस प्रकार तुर्क सेना ने तिरहुत की राजधानी डुमरॉवगढ़ पर अधिकार कर लिया और अहमद नामक को राज्य की कमान सौंपकर दिल्ली लौट गया। गयासुद्दीन की १३२५ ई. में मृत्यु के बाद उसका पुत्र उलूख खान बाद में जौना सा मुहम्मद-बिन-तुगलक नाम से दिल्ली का सुल्तान बना।
 
[[मुहम्मद बिन तुग़लक़|मुहम्मद-बिन-तुगलक]] के काल में बिहार के प्रान्तपति मखदूल मुल्क था, जिसे कर्नाट वंश के राजा हरिसिंह देव के खिलाफ अभियान चलाकर नेपाल भागने के लिए मजबूर कर दिया था। इस प्रकार तिरहुत क्षेत्र को तुगलक साम्राज्य में मिला लिया तथा इस क्षेत्र का नाम तुगलकपुर रखा गया, जो वर्तमान दरभंगा है। दरभंगा में मुहम्मद-बिन-तुगलक ने एक दुर्ग और जामा मस्जिद बनवाई। इसी के समकालीन सूफी सन्त हजरत शर्फुउद्दीन याहया मेनरी का बिहार में आगमन हुआ। १३५१ ई. मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद दिल्ली का सुल्तान उसका चचेरा भाई फिरोज तुगलक बना।
 
तत्कालीन बंगाल के शासक हाजी इलियास ने ओएन वारा के शासक कामेश्‍वर सिंह के विरोध के बावजूद तिरहुत क्षेत्र को दो भागों में विभाजित कर दिया था और स्वयं बहराइच तक बढ़
तुगलक काल में बिहार की राजधानी बिहार शरीफ थी। बिहार राज्य का बिहार नाम भी इसी काल में पड़ा था। इस काल में बिहार के प्रशासकों में सबसे महत्वपूर्ण मलिक इब्राहिम था। बिहार शरीफ पहाड़ी पर स्थित इनका मकबरा तुगलक कालीन स्थापत्यकला का मन्दिर उदाहरण है
 
१३८८ ई. में फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु के बाद मध्यकालीन बिहार का दिल्ली सल्तनत में विघटन प्रक्रिया शुरु हो गई। फिरोजशाह के उत्तराधिकारी निष्क्रमण और कमजोर थे जो बिहार पर नियन्त्रण न रख सके। यही स्थिति दिल्ली सुल्तान [[सैयद वंश]] के शासकों में रही फलतः बिहार का क्षेत्र जौनपुर राज्य के अधीन हो गया। जौनपुर में शर्की वंशीय शासक थे जिससे जौनपुर और दिल्ली में संघर्ष प्रारम्भ हो गया। अन्तिम शर्की शासक हुसैन शाह शर्की (१४५८-१५०५ ई.) के समय बिहार भी संघर्ष में फँसा रहा। १४८९ ई. में जौनपुर पर लोंदी वंश का अधिकार होने के बाद बिहार में नुहानी वंश का उदय हुआ।
 
== [[चेरो राजवंश]] ==
 
== [[शेरशाह सूरी]] ==
[[शेरशाह सूरी]] का वास्तविक नाम फरीद खाँ था। वह वैजवाड़ा (होशियारपुर १४७२ ई. में) में अपने पिता हसन की अफगान पत्‍नी से उत्पन्न पुत्र था। उसका पिता हसन बिहार के सासाराम का जमींदार था। दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खाँ लोहानी ने उसे एक शेर मारने के उपलक्ष्य में शेर खाँ की उपाधि से सुशोभित किया और अपने पुत्र जलाल खाँ का संरक्षक नियुक्‍त किया। बहार खाँ लोहानी की मृत्यु के बाद शेर खाँ ने उसकी बेगम दूदू बेगम से विवाह कर लिया और वह दक्षिण बिहार का शासक बन गया। इस अवधि में उसने योग्य और विश्‍वासपात्र अफगानों की भर्ती की। १५२९ ई. में बंगाल शासक नुसरतशाह को पराजित करने के बाद शेर खाँ ने हजरत आली की उपाधि ग्रहण की। १५३० ई. में उसने चुनार के किलेदार ताज खाँ की विधवा लाडमलिका से विवाह करके चुनार के किले पर अधिकार कर लिया। १५३४ ई. में शेर खाँ ने सुरजमठ के युद्ध में बंगाल शासक महमूद शाह को पराजित कर १३ लाख दीनार देने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार शेरशाह ने अपने प्रारम्भिक अभियान में दिल्ली, आगरा, बंगाल, बिहार तथा पंजाब पर अधिकार कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। १५३९ ई. में चौसा के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर शेर खाँ ने शेरशाह की अवधारणा की। १५४० ई. में शेरशाह ने [[हुमायूँ]] को पुनः हराकर राजसिंहासन प्राप्त किया। उत्तर बिहार में पहले से ही हाकिम मखदूग आलम शासन कर रहा था। नुसरतशाह ने दक्षिण बिहार पर प्रभाव स्थापित करने के लालच में कुत्य खाँ के साथ एक सेना भेजी, परन्तु शेर खाँ ने उसे पराजित कर दिया। शेर खाँ धीरे-धीरे सर्वाधिक शक्‍तिशाली अफगान नेता बन गया।
 
नूहानी सरदारों ने उनकी हत्या के लिए असफल कोशिश की और जब शेर खाँ ने उनको नुसरतशाह के विरुद्ध युद्ध कर दिया और पराजित कर दिया। इस विजय ने बंगाल के सुल्तान की महत्वाकांक्षी योजना को विफल कर दिया। बाबर के समय शेर खाँ हमेशा अधीनता का प्रदर्शन करता रहा था परन्तु हुमायूँ के समय में अपना रुख बदलकर चुनार गढ़ को लेकर प्रथम बार चुनार लेने की चेष्टा की तब उसे महमूद लोदी के प्रत्याक्रमण के कारण वहाँ से जाना पड़ा। उसने हिन्दूबेग को सेना भेजकर शेर खाँ ने दुर्ग देने से साफ इनकार कर दिया। फलतः एक युद्ध हुआ।
[[कन्नौज]] (बिलग्राम १५४० ई.) का युद्ध- हुमायूँ चौसा के युद्ध में पराजित होने के बाद कालपीहोता आगरा पहुँचा, वहाँ मुगल परिवार के लोगो ने शेर खाँ को पराजित करने का निर्णय लिया। शेरशाह तेजी से दिल्ली की और बढ़ रहा था फलतः मुगल बिना तैयारी के कन्‍नौज में आकर भिड़ गये। तुरन्त आक्रमण के लिए दोनों में से कोई तैयार नहीं था। शेरशाह ख्वास खाँ के आने की प्रतीक्षा में था। हुमायूँ की सेना हतोत्साहित होने लगी। मुहम्मद सुल्तान मिर्जा और उसका शत्रु रणस्थल से भाग खड़े हुए। कामरान के ३ हजार से अधिक सैनिक भी भाग खड़े हुए फलतः ख्वास खाँ, शेरशाह से मिल गया। शेरशाह ने ५ भागों में सेना को विभक्‍त करके मुगलों पर आक्रमण कर दिया।
 
जिस रणनीति को अपनाकर [[पानीपत का प्रथम युद्ध|पानीपत के प्रथम युद्ध]] में अफगान की शक्‍ति को समाप्त कर दिया उसी नीति को अपनाकर शेरशाह ने हुमायूँ की शक्‍ति को नष्ट कर दिया। मुगलों की सेना चारों ओर से घिर गयी और पूर्ण पराजय हो गयी। हुमायूँ और उसके सेनापति आगरा भाग गये। इस युद्ध में शेरशाह के साथ ख्वास खाँ, हेबत खाँ, नियाजी खाँ, ईसा खाँ, केन्द्र में स्वयं शेरशाह, पार्श्‍व में बेटे जलाल खाँ और जालू दूसरे पार्श्‍व में राजकुमार आद्रित खाँ, कुत्बु खाँ, बुवेत हुसेन खाँ, जालवानी आदि एवं कोतल सेना थी। दूसरी और हुमायूँ के साथ उसका भाई हिन्दाल व अस्करी तथा हैदर मिर्जा दगलात, यादगार नसरी और कासिम हुसैन सुल्तान थे।
 
== शेरशाह का राज्याभिषेक ==
पश्‍चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा- शेरशाह ने सर्वप्रथम पश्‍चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया। उसने मुगलों के प्रभाव को पूर्णतः समाप्त कर दिया। मुगलों पर विशेष नजर रखने के लिए एक गढ़ बनवया जिसका निर्माण टोडरमल और हैबत खाँ नियाजी की अध्यक्षता में करवाया गया और इस्लामशाह के काल में पूरा हुआ। हुमायूँ का पीछा करते हुए शेरशाह मुल्तान तक गया वहाँ बलूची सरदारों ने भी उसको सम्राट मानकर अधीनता स्वीकार की। मुल्तान के लिए पृथक्‌ हाकिम नियुक्‍त किया गया। निपुण सेनानायकों मसलन हैबत खाँ नियाजी, ख्वास खाँ, राय हुसैन जलवानी आदि की नियुक्‍ति की। उसे ३० हजार सेना रखने की अनुमति दे दी।
 
मालवा पर अधिकार- मारवाड़ में [[मालदेव राठौड़|मालदेव राठौड़]] शासन कर रहा था। शेरशाह के भय से हुमायूँ मालदेव की शरण में गया। शेरशाह ने हुमायूँ को बन्दी बनाकर सौंप देने का सम्वाद भेजा लेकिन मालदेव ने ऐसा नहीं किया।
 
फलतः शेरशाह ने अप्रसन्‍न होकर १५४२ ई. में मालवा पर आक्रमण कर दिया। राजपूत सामन्तों ने शेरशाह का पूरी बहादुरी के साथ मुकाबला किया लेकिन शेरशाह की सेना के सामने टिक नहीं सके फलतः १५४३ ई. तक विजय प्राप्त की। इस दौरान पूरनमल ने भी अधीनता स्वीकार कर ली।
 
इस युद्ध में राजपूतों की वीरता देखकर शेरशाह ने अपने उद्‍गार प्रकट किए थे- मैंने मुट्ठी भर बाजरे के लिए (इस प्रदेश की मुख्य फसल थी) लगभग अपना साम्राज्य ही खो दिया था। बाद में सारंगपुर में कादिरशाह ने अधीनता स्वीकार कर ली। इस प्रकार [[माण्डू|मांडू]] और सतवास पर शेरशाह का अधिकार हो गया।
 
शेरशाह ने शुजात खाँ को रूपवास में, दरिया खाँ को उज्जैन में, आलम खाँ को सारंगपुर में, पूरनमल को रायसीन में तथा मिलसा को चन्देरी में नियुक्‍त किया। शेरशाह ने बाद में शुजात खाँ को सम्पूर्ण मालवा का हाकिम नियुक्‍त किया और १२ हजार सैनिक रखने की अनुमति दे दी।
बिहार के महान अफगान सम्राट शेरशाह का स्थापित सूर वंश के पतन के बाद भी बिहार अफगानो के अधीन बना रहा। ताज खाँ करारानी, सुलेमान खाँ एवं दाऊद खाँ करारानी आदि के अधीन में रहा।
 
इन अफगान शासकों ने बिहार पर अपना नियन्त्रण १५८० ई. तक बनाये रखा। सुलेमान खाँ ने १५५६ ई. से १५७२ ई. तक शासन किया और अपना अधिकार क्षेत्र को उड़ीसा तक विस्तार किया। उसने तत्कालीन सम्राट के साथ सम्मानप‘ऊर्ण व्यवहारिकता बनाये रखी, लेकिन उसका पुत्र दाऊद खाँ करारानी ने अकबर के प्रति अहंकारी रवैया अपनाया। फलतः मुगल शासक [[अकबर]] ने १५७४ ई. में बिहार पर आक्रमण किया और पटना पर अधिकार कर लिया। दाऊद खाँ भाग गया। बिहार मुगलों के अधीन १५७४ ई. से १५८० ई. तक पूर्णत हो गया। १५८० ई. तक बिहार को मुगल साम्राज्य एक प्रान्त के रूप में घोषित कर दिया गया।
 
अफगानों ने विद्रोह का झण्डा बुलन्द किया तथा खान-ए-खनाम मुनीम खान को बिहार का गवर्नर नियुक्‍त किया गया। मुजफ्फर खान, [[टोडरमल]] एवं मुनीम खाँ ने इस अवधि में रोहतासगढ़, सूरजगढ़, मुंगेर भागलपुर एवं अन्य इलाकों पर कब्जा कर लिया।
 
अफगानों के छुटपुट नेता बहादुर खान, अधम खाँ, बतनी खाँ, दरिया खाँ नूहानी इत्यादि का विद्रोह हुआ, जिसे मुजफ्फर खान ने दबाया। मुजफ्फर खान ने गंगा पार कर चम्पारण के जमींदार उदय सिंह करण से सहायता प्राप्त कर विद्रोही पर आक्रमण कर हाजीपुर को जीता। पुनः मुजफ्फर खान अफगानों के जमावड़ों की खबर पाकर (मरहा गंडक नदी के पास) पहुँचा, लेकिन इसी युद्ध में मुगल सेना हार गयी और इस पराजय से मुगल सेना में गहरी मायूसी छाई हुई थी, लेकिन मुजफ्फर खान पुनः मुगल सेना को संगठित कर पुनः अफगान विद्रोही पर आक्रमण कर दिया। इस संघर्ष में ताज खाँ पनवार भाग गया तथा अफगान जमाल खान गिलजई गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद बिहार का गवर्नर (१५७५-८१ ई.) तक मुजफ्फर खान बना रहा।
इसी अवधि में मुनीम खाँ ने बंगाल और उड़ीसा के शासक दाऊद खाँ को पराजित करके मुगल प्रभुत्व की स्थापना की परन्तु अक्टूबर १५७५ ई. में मुनीम खाँ की मृत्यु हो जाने के बाद दाऊद खाँ ने पुनः सम्पूर्ण बंगाल पर अधिकार कर लिया। अकबर ने हुसैन कुली को बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा साथ-साथ बिहार के गवर्नर मुजफ्फर खान के खिलाफ ५,००० सेना भी भेजी। १५८२ ई. में खान-ए-आजम भी शाही दरबार में लौट गया, परन्तु विद्रोह भड़क जाने के कारण पुनः बिहर लौट गया और वह बिहार को पूर्णतः विद्रोह मुक्‍त कर दिया। अब मुगलों ने बंगाल में उठे विद्रोह को दबाने की कोशिश करने लगा। बिहार के प्रमुख अधिकारियोंं एवं खान-ए-आजम, भी बंगाल गये। बारी-बारी से खान-ए-आजम, शाहनबाज, सईद खान चधता तथा युसूफ खाँ को भेजा गया। अन्त में सईद खान को गवर्नर बनाकर ये सभी अधिकारी शाही दरबार में चले गये। सईद खान को बंगाल का सूबेदार बनाया गया।
 
१५८७ ई. में कुँवर मानसिंह को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त किया गया। १५८९ ई. में राजा [[भगवान दास]] की मत्यु के पश्‍चात्‌ [[राजा मान सिंह|मानसिंह]] को राजा की पद्‍वी दी गई। उन्होंने गिद्दौर के राजा पूरनमल की पुत्री से शादी की। खड्‍गपुर के राजा संग्राम सिंह एवं चेरो राजा अनन्त सिंह को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।
 
[[राजा मानसिंह]] के पुत्र जगत सिंह ने बंगाल के विद्रोही सुल्तान कुली कायमक एवं कचेना (जो बिहार के तांजपुर एवं दरभंगा में उत्पात मचा रहे थे) को शान्त किया। बिहार में मुगलों की सत्ता स्थापित होने के दौर में अफगानों ने अनेक बार विद्रोह किये।
इस प्रकार [[अकबर]] के समय बिहार पठानों एवं मुगलों की लड़ाई का केन्द्र बना रहा और भोजपुर तथा उज्जैन ने मुगलों से ज्यादा पठानों के साथ अपना नजदीकी सम्बन्ध बनाये रखा। अकबर के अन्तिम समय में बिहार सलीम के विद्रोह से मुख्य रूप से प्रभावित हुआ। तत्कालीन गवर्नर असद खान को हटाकर असफ खान को गवर्नर नियुक्‍त किया गया।
 
जब [[जहाँगीर]] ने दिल्ली के राजसिंहासन १६०६ ई. में बैठा, तब उसने बिहार का सूबेदार लाल बेग या बाज बहादुर को नियुक्‍त किया। बाज बहादुर ने खडगपुर ने राजा संग्रामसिंह के विद्रोह को सफलतापूर्वक दबाया। बाज बहादुर ने नूरसराय का निर्माण कराया (जो स्थानीय परम्पराओं के अनुसार दरभंगा में एक मस्जिद एवं एक सराय है) यह नूरसराय मेहरुनिसा ([[नूर जहाँ|नूरजहाँ]]) के बंगाल से दिल्ली जाने के क्रम में यहाँ रुकने के क्रम में बनायी गयी थी। १६०७ ई. बाज बहादुर ने जहाँगीर कुली खान की उपाधि पा गया था और उसे बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा गया। इसके बाद इस्लाम खान बिहार का गवर्नर बन गया १६०८ ई. में पुनः उसे भी बंगाल का गवर्नर बना दिया गया। इस्लाम के बाद अबुल फजल का पुत्र अब्दुर्रहीम या अफजल खान बिहार का सूबेदार बना तथा कुतुबशाह नामक विद्रोही को कुछ कठिनाइयों के बाद सफलतापूर्वक दबा दिया गया था।
 
१६१३ ई. में अफजल खान की मृत्यु के बाद जफर खान बिहार का सूबेदार बना। १६१५ ई. में नूरजहाँ का भाई इब्राहिम खाँ बिहार का सूबेदार बना लेकिन खडगपुर के राजा संग्राम सिंह के पुत्र द्वारा इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद उसने अपना राज्य प्राप्त कर लिया। इब्राहिम खान को १६१७ ई. में बंगाल के गवर्नर के रूप में स्थानान्तरण किया गया तथा जहाँगीर कुली खाँ द्वितीय को १६१८ ई. तक बिहार का गवर्नर नियुक्‍त कर दिया। फिर एक बार अफगानों और मुगलों की सेना के बीच १२ जुलाई १५७६ को राजमहल का युद्ध हुआ और अफगान पराजित हुए। इधर भोजपुर एवं जगदीशपुर में उज्जैन सरदार राजा गज्जनशाही ने विद्रोह कर दिया। प्रारम्भ में मुगल सेना को काफी सहायता दी। उसने विद्रोह कर आरा पर कब्जा जमाया और वहाँ के जागीरदार फरहत खाँ को घेर लिया। उसका पुत्र फहरंग खान ने अपने पिता को गज्जनशाही के घेरे से मुक्‍त कराने का प्रयास किया, परन्तु इस प्रयास में वह मारा गया तथा फरहत भी मारा गया। गज्जनशाही गाजीपुर की ओर खान-ए-जहाँ के परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार करने के उद्देश्य से गया लेकिन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्‍त शाहवाज खान कम्बो ने पीछा करते हुए जगदीशपुर पहुँच गया और तीन माह तक घेराबन्दी कर अन्त में उसे पराजित कर दिया।
शाइस्ता खाँ ने १६४२ ई. में चेरो शासकों को पराजित कर दिया। उसके बाद उसने मिर्जा सपुर या इतिहाद खाँ को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त कर दिया। १६४३ ई. से १६४६ ई. तक चेरी शासक के खिलाफ पुनः अभियान चलाया गया। १६४६ ई. में बिहार का सूबेदार आजम खान को नियुक्‍ किया गया। उसके बाद सईद खाँ बहादुर जंग को सूबेदार बनाया। इसके प्रकार १६५६ ई. में जुल्फिकार खाँ तथा १६५७ ई. में अल्लाहवर्दी ने बिहार का सूबेदारी का भा सम्भाला। अल्लाहवर्दी खान शाहजादा शुजा का साथ देने लगा, लेकिन शाही सेना ने शहजादा सुलेमान शिकोह एवं मिर्जा राजा जयसिंह के नेतृत्व में शहजादा शुजा को पराजित कर दिया। १६ जनवरी १६५९ को खानवा के युद्ध में औरंगजेब ने शुजा को पराजित किया और शुजा बहादुर पटना एवं मुंगेर होते हुए राजमहल पहुँच गया।
 
[[औरंगजेब|मुईउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब]] [[शाह जहाँ|शाहजहाँ]] तथा मुमताजमुुुमताज महल का छठवाँ पुत्र था जब औरंगजेब दिल्ली (५ जून १६५९) को सम्राट बना तो बिहार का गवर्नर दाऊद खाँ कुरेशी को नियुक्‍त किया गया। वह १६५९ ई. से १६६४ ई. तक बिहार का सूबेदार रहा। दाऊद खाँ के बाद १६६५ ई. में बिहार में लश्कर खाँ को गवर्नर बनाया गया इसी के शासन काल में अंग्रेज यात्री बर्नीयर बिहार आया था। उसने अपने यात्रा वृतान्त में सामान्य प्रशासन एवं वित्तीय व्यवस्था का उल्लेख किया है। उस समय पटना शोरा व्यापार का केन्द्र था। वह पटना में आठ वर्षों तक रहा। १६६८ ई. में लश्कर खाँ का स्थानान्तरण कर इब्राहिम खाँ बिहार का सूबेदार बना। इसके शासनकाल में बिहार में जॉन मार्शल आया था। उसने भयंकर अकाल का वर्णन किया है।
 
एक अन्य डच यात्री डी ग्रैफी भी इब्राहिम के शासनकाल में आया था। जॉन मार्शल ने बिहार के विभिन्‍न शहर भागलपुर, मुंगेर, फतुहा एवं हाजीपुर की चर्चा की है।
फिदा खाँ १६९५ ई. से १७०२ ई. तक बिहार का सूबेदार बना रहा। इस अवधि में तिरहुत और संथाल परगना (झारखण्ड) में अशान्ति रही। कुंवर धीर ने विद्रोह कर दिया। इसे पकड़कर दिल्ली लाया गया। फिदा खाँ के बाद शहजादा अजीम बिहार के साथ-साथ बंगाल का भी शासक बना। शहजादा अजीम आलसी और आरामफरोश होने के कारण शीघ्र ही सत्ता का भार करतलब खाँ को दे दिया गया जो बाद में मुर्शिद कुली खाँ के नाम से जाना गया। परस्पर सम्बन्ध में कतुता आ गयी। १७०४ ई. में शहजादा अजीम स्वयं पटना पहुँचा। प्रशासनिक सुदृढ़ता के कारण शहर (पटना) का नाम अजीमाबाद रखा गया। बाद में अलीमर्दन के विद्रोह को दबाने को चला गया। १७०७ ई. में जब औरंगजेब की मृत्यु हो गई तथा बहादुरशाह १७०७ ई. में शसक बना और १७१२ ई. तक दिल्ली का शासक रहा तब राजकुमार अजीम बिहार का गवर्नर पद पर अधिक शक्‍ति के साथ बना हुआ था। उसका नाम अजीम उश शान हो गया।
 
१७१२ ई. में [[बहादुर शाह प्रथम|बहादुरशाह]] की मृत्यु हो गयी तो अजीम उश शान ने भी दिल्ली की गद्दी प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन वह असफल होकर मारा गया। जब दिल्ली की गद्दी पर [[जहांदार शाह|जहाँदरशाह]] बादशाह बना तब अजीम उश शान का पुत्र [[फ़र्रुख़ सियर|फर्रुखशियर]] पटना में था। उसने अपना राज्याभिषेक किया और आगरा पर अधिकार के लिए चल पड़ा। आगरा के समीप फर्रुखशियर ने जहाँदरशाह को पराजित कर दिल्ली का बादशाह बन गया।
 
१७०२ ई. में मुगल सम्राट [[औरंगजेब]] के पौत्र राजकुमार को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त किया गया। प्रशासनिक सुधार उन्होंने विशेष रूप से पटना में किया फलतः पटना का नाम बदलकर ‘अजीमाबाद’ रख दिया।
खैरात खाँ- १७१२ ई. से १७१४ ई. तक, मीलू जुमला- १७१४ ई. से १७१५ ई. तक, सर बुलन्द खाँ-१७१६ ई. से १७१८ ई. तक बना। इस दौरान जमींदारों के खिलाफ अनेक सैनिक अभियान चलाए गये। भोजपुर के उज्जैन जमींदार सुदिष्ट नारायण का विद्रोह, धर्मपुर के जमींदार हरिसिंह का विद्रोह आदि प्रमुख विद्रोही थे। इन विद्रोहियों का तत्कालीन गवर्नर सूर बुलन्द खाँ ने दमन किया। सूर बुलन्द खाँ के पश्‍चात्‌ खान जमान खाँ १७१८-२१ ई. में बिहार का सूबेदार बना। अगले पाँच वर्षों के लिए नुसरत खाँ को बिहार का नया गवर्नर बना दिया गया। बाद में फखरुद्दौला बिहार का सूबेदार बनकर उसने छोटा नागपुर, पलामू (झारखण्ड) जगदीशपुर के उदवन्त सिंह के खिलाफ सैन्य अभियान छेड़ा।
 
इसी के शासनकाल में ही पटना में दाऊल उदल (कोर्ट ऑफ जस्टिस) का निर्माण किया गया। परन्तु कुछ कारणवश इन्हें १७३४ ई. में पद से विमुक्‍त कर दिया गया। फखरुद्दौला की नियुक्‍ति के बाद शहजादा मिर्जा अहमद को बिहार का नाममात्र का अधिकारी गवर्नर नियुक्‍त किया गया बाद में इसे सहायक रूप में बंगाल में (नाजिम शुजाउद्दीन) को नियुक्‍त किया गया। [[शुजा-उद-दीन मुहम्मद खान|शुजाउद्दीन]] ने अपने विश्‍वत अधिकारी [[अलीवर्दी खान|अलीवर्दी खाँ]] को अजीमाबाद में शासन की देखभाल के लिए भेजा। वह अजीमाबाद (पटना में) १७३४ ई. से १७४० ई. तक नवाब बना रहा। उसने अपनी शासन अवधि में बिहार के विद्रोहों को दबाया और एक सश्रम प्रणाली का विकास कर राज्य की आय में बढ़ोत्तरी की। यही बढ़ी आय को उसने बंगाल अभियान में लगाया। वह १७३९ ई. में शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद गिरियाँ युद्ध में शुजाउद्दीन के वंशज को हराकर बिहार और बंगाल का स्वतन्त्र नवाब बन गया। इसी समय बंगाल पर मराठों और अफगानों का खतरा बढ़ गया। अफगानों ने १७४८ ई. में हैबतजंग की हत्या कर दी।
 
अलीवर्दी खाँ ने स्वयं रानी सराय एवं पटना के युद्ध में अफगान विद्रोहियों को शान्त किया। उसने १७५१ ई. में फतुहा के पास मराठों को पराजित किया था किन्तु मराठों ने उड़ीसा के अधिकांश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसमें मराठा विद्रोही का नेतृत्व रघु जी के पुत्र भानु जी ने किया था।
 
१७५६ ई. में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद [[सिराजुद्दौला]] बंगाल का नवाब बना लेकिन एक प्रशासनिक अधिकारी रामनारायण को बिहार का उपनवाब बनाया गया।
 
अप्रैल, १७६६ में सिराजुद्दौला बंगाल की गद्दी पर बैठा, गद्दी पर बैठते ही उसे शौकत जंग, घसीटी बेगम तथा उसके दीवान राज वल्लभ के सम्मिलित षड्‍यन्त्र का सामना करना पड़ा।
 
सिराजुद्दौला का प्रबल शत्रु [[मीर जाफ़र|मीर जाफर]] था। वह अलीवर्दी खाँ का सेनापति था। मीर जाफर बलपूर्वक बंगाल की गद्दी पर बैठना चहता था दूसरी तरफ अंग्रेज बंगाल पर अधिकार के लिए षड्‍यन्त्रकारियों की सहायता करते थे।
 
फलतः व्यापारिक सुविधाओं के प्रश्‍न पर तथा फरवरी, १७५७ ई. में हुई अलीनगर की सन्धि की शर्तों का ईमानदारी के पालन नहीं करने के कारण २३ जून १७५७ में प्लासी के मैदान में क्लाइव और नवाब सेना के बीच युद्ध हुआ। युद्ध में सिराजुद्दौला मारा गया। इसके बाद मीर जाफर बंगाल का नवाब बना।
रिजकुल्लाह की वकियाते मुश्ताकी, शेख कबीर की अफसानाएँ से भी सोलहवीं शताब्दी बिहार की जानकारी प्राप्त होती है।
 
मध्यकालीन मुगलकालीन बिहार के सन्दर्भ में जानकारी अबुल फजल द्वारा रचित [[अकबरनामा]] से प्राप्त होती है। आलमगीरनामा से मुहम्मद कासिम के सन्दर्भ में बिहार की जानकारी होती है।
 
उत्तर मुगलकालीन ऐतिहासिक स्रोत गुलाम हुसैन तबाताई की सीयर उल मुताखेरीन, करीम आयी मुजफ्फरनामा, राजा कल्याण सिंह का खुलासातुत तवासिरत महत्वपूर्ण है जिसमें बंगाल और बिहार के जमींदारों की गतिविधियों की चर्चा है। बाबर द्वारा रचित तुजुके-ए-बाबरी एवं जहाँगीर द्वारा रचित तुजुके में भी बिहार के मुगल शासनकालीन गतिविधियों की जानकारी मिलती है। इन दोनों ग्रन्थों से अपने समय में मुगलों की बिहार के सैनिक अभियान की जानकारी प्राप्त होती है।
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