"बिहार का मध्यकालीन इतिहास" के अवतरणों में अंतर

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रुकनुद्दीन कैकाउस की मृत्यु की बाद बिहार पर लखनौती का नियन्त्रण समाप्त हो गया। फिरोज ऐतगीन ने सुल्तान शमसुद्दीन फिरोजशाह के नाम से एक राजवंश बनाया १३०५-१५ ई. तक हातिम खाँ बिहार का गवर्नर बना रहा।
 
इस प्रकार बिहार पर [[ख़िलजी वंश|खिलजी वंश]] का प्रभाव कम और सीमित क्षेत्रों पर रहा। (जो अवध का गवर्नर था) इवाज को गिरफ्तार कर हत्या कर दी। अवध, बिहार और लखनौती को मिलाकर एक कर दिया। १२२७-२९ ई. तक उसने शासन किया। १२२९ ई. में उसकी मृत्यु के बाद दौलतशाह खिलजी ने पुनः विद्रोह कर दिया, परन्तु इल्तुतमिश ने पुनः लखनौती जाकर वल्ख खिलजी को पराजित कर दिया तथा बिहार और बंगाल को पुनः अलग-अलग कर दिया। उसने अलालुद्दीन जानी को बंगाल का गवर्नर एवं सैफूद्दीन ऐबक को बिहार का राज्यपाल नियुक्‍त किया बाद में तुगान खाँ बिहार का राज्यपाल बना। उसके उत्तराधिकारियों में क्रमशः रुकनुद्दीन फिरोजशाह, [[रज़िया सुल्तान|रजिया]] मुइज्जुद्दीन, ब्रह्यराय शाह एवं अलाउद्दीन मसूद शाह आदि शासकों ने लखनौती एवं बिहार के तथा दिल्ली के प्रति नाममात्र के सम्बन्ध बनाये रखे।
 
== [[बलबन]] ==
तुगलक वंश के समय में ही मुख्य रूप से बिहार पर दिल्ली के सुल्तानों का महत्वपूर्ण वर्चस्व कायम हुआ। गयासुद्दीन तुगलक ने १३२४ ई. में बंगाल अभियान से लौटते समय उत्तर बिहार के कर्नाट वंशीय शासक हरिसिंह देव को पराजित किया। इस प्रकार तुर्क सेना ने तिरहुत की राजधानी डुमरॉवगढ़ पर अधिकार कर लिया और अहमद नामक को राज्य की कमान सौंपकर दिल्ली लौट गया। गयासुद्दीन की १३२५ ई. में मृत्यु के बाद उसका पुत्र उलूख खान बाद में जौना सा मुहम्मद-बिन-तुगलक नाम से दिल्ली का सुल्तान बना।
 
[[मुहम्मद बिन तुग़लक़|मुहम्मद-बिन-तुगलक]] के काल में बिहार के प्रान्तपति मखदूल मुल्क था, जिसे कर्नाट वंश के राजा हरिसिंह देव के खिलाफ अभियान चलाकर नेपाल भागने के लिए मजबूर कर दिया था। इस प्रकार तिरहुत क्षेत्र को तुगलक साम्राज्य में मिला लिया तथा इस क्षेत्र का नाम तुगलकपुर रखा गया, जो वर्तमान दरभंगा है। दरभंगा में मुहम्मद-बिन-तुगलक ने एक दुर्ग और जामा मस्जिद बनवाई। इसी के समकालीन सूफी सन्त हजरत शर्फुउद्दीन याहया मेनरी का बिहार में आगमन हुआ। १३५१ ई. मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद दिल्ली का सुल्तान उसका चचेरा भाई [[फ़िरोज़ शाह तुग़लक़|फिरोज शाह तुगलक]] बना।
 
तत्कालीन बंगाल के शासक हाजी इलियास ने ओएन वारा के शासक कामेश्‍वर सिंह के विरोध के बावजूद तिरहुत क्षेत्र को दो भागों में विभाजित कर दिया था और स्वयं बहराइच तक बढ़
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