"समुद्रगुप्त" के अवतरणों में अंतर

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'उसका मन सत्संगसुख का व्यसनी था। उसके जीवन में सरस्वती और लक्ष्मी का अविरोध था। वह वैदिक धर्म का अनुगामी था। उसके काव्य से कवियों के बुद्धिवैभव का विकास होता था। ऐसा कोई भी सद्गुण नहीं है जो उसमें न रहा हो। सैकड़ों देशों पर विजय प्राप्त करने की उसकी क्षमता अपूर्व थी। स्वभुजबल ही उसका सर्वोत्तम सखा था। परशु, बाण, शकु, आदि अस्त्रों के घाव उसके शरीर की शोभा बढ़ाते थे। उसकी नीति थी साधुता का उदय हो तथा असाधुता कर नाश हो। उसका हृदय इतना मृदुल था कि प्रणतिमात्र से पिघल जाता था। उसने लाखों गायों का दान किया था। अपनी कुशाग्र बुद्धि और संगीत कला के ज्ञान तथा प्रयोग से उसने ऐसें उत्कृष्ट काव्य का सर्जन किया था कि लोग 'कविराज' कहकर उसका सम्मान करते थे।'
 
समुद्रगुप्त के सात प्रकार के सिक्के मिल चुके हैं, जिनसे उसकी शूरता, शुद्धकुशलता तथा संगीतज्ञता का पूर्ण आभास मिलता है। इसने सिंहल के राजा मेघवर्ण को बोधगया में बौद्धविहार बनाने की अनुमति देकर अपनी महती उदारता का परिचय दिया था। यह भारतवर्ष का प्रथ आसेतुहिमाचल का सम्राट् था। इसकी अनेक रानियों में पट्टमहिषी दत्त देवी थी, जिनसे सम्राट् चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने जन्म दिया था। वे भारत के सबसे बड़े और महान सम्राट थे। वे भारत के ऐसे आखिरी सम्राट हुए जिन्होंने मिस्र , फारस , बेबीलौन को भी अपने शत प्रतिशत नियंत्रण में रखा । उन्होंने समस्त भारत पर शासन किया।
 
== प्रारंभिक जीवन ==