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;तांत्रिक दृष्टि के सिद्धांत
तांत्रिक दृष्टि<ref name="Pattanaik 2017">{{cite web | last=Pattanaik | first=Devdutt | title=Devdutt Pattanaik: A ring of tantrik women | website=mid-day | date=17 दिसम्बर 2017 | url=http://www.mid-day.com/articles/devdutt-pattanaik-a-ring-of-tantrik-women/18830155 | language =अंग्रेजी en भाषा | accessdate=20 दिसम्बर 2017}}</ref> से ज्ञान का प्रकाश इस अनुभव से आता है कि विपरीत लगने वाले दो सिद्धांत वास्तव में एक ही हैं; शून्यता (रिक्तता) और प्रज्ञा (ज्ञान) की निष्क्रिय अवधारणाओं के साथ सक्रिय करुणा तथा उपाय (साधन) भी संकल्पित होने चाहिये। इस मूल ध्रुवता और इसके संकल्प को अकसर काम-वासना के प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। वज्रयान की ऐतिहासिक उत्पत्ति तो स्पष्ट नहीं है, केवल इतना ही पता चलता है कि यह बौद्धमत की बौद्धिक विचारधारा के विस्तार के साथ ही विकसित हुआ। यह छठी से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच फला-फूला और भारत के पड़ोसी देशों पर इसका स्थायी प्रभाव पड़ा। वज्रयान की संपन्न दृश्य कला पवित्र ‘मंडल’ के रूप में अपने उत्कर्ष तक पहुँच गई थी, जो ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्त्व करता है और साधना के माध्यम के रूप में प्रयुक्त होता है।
 
==इन्हें भी देखे==