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'''कुशीनगर''' एवं '''कसिया बाजार''' [[उत्तर प्रदेश]] के उत्तरी-पूर्वी सीमान्त इलाके में स्थित एक क़स्बा एवं ऐतिहासिक स्थल है। "कसिया बाजार" नाम कुशीनगर में बदल गया है और उसके बाद "कसिया बाजार" आधिकारिक तौर पर "कुशीनगर" नाम के साथ नगर पालिका बन गया है। यह बौद्ध तीर्थ है जहाँ [[गौतम बुद्ध]] का महापरिनिर्वाण हुआ था। कुशीनगर, [[राष्ट्रीय राजमार्ग २८]] पर [[गोरखपुर]] से कोई ५० किमी पूरब में स्थित है। यहाँ अनेक सुन्दर बौद्ध मन्दिर हैं। इस कारण से यह एक अन्तरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल भी है जहाँ विश्व भर के बौद्ध तीर्थयात्री भ्रमण के लिये आते हैं। कुशीनगर कस्बे के और पूरब बढ़ने पर लगभग २० किमी बाद [[बिहार]] राज्य आरम्भ हो जाता है।
 
यहाँ बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बुद्ध इण्टरमडिएट कालेज तथा कई छोटे-छोटे विद्यालय भी हैं। अपने-आप में यह एक छोटा सा कस्बा है जिसके पूरब में एक किमी की दूरी पर '''[[कसयां]]''' नामक बड़ा कस्बा है। कुशीनगर के आस-पास का क्षेत्र मुख्यत: कृषि-प्रधान है। जन-सामन्य की बोली [[भोजपुरी]] है। यहाँ [[गेहूँ]], [[धान]], [[गन्ना]] आदि मुख्य फसलें पैदा होतीं हैं।
 
[[बुद्ध पूर्णिमा]] के अवसर पर कुशीनगर में एक माह का [[मेला]] लगता है। यद्यपि यह तीर्थ महात्मा बुद्ध से संबन्धित है, किन्तु आस-पास का क्षेत्र [[हिन्दू]] बहुल है। इस मेले में आस-पास की जनता पूर्ण श्रद्धा से भाग लेती है और विभिन्न मन्दिरों में पूजा-अर्चना एवं दर्शन करती है। किसी को संदेह नहीं कि बुद्ध उनके 'भगवान' हैं।
 
कुशीनगर उत्तरजनपद प्रदेश के, गोरखपुर मंडल के अंतर्गत एक जनपदआता है। यह क्षेत्र पहले कुशीनारा के नाम से जाना जाता था जहां बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था। कुशीनगर जिले का प्रशासनिक प्रभाग [[पडरौना]] में है। क्षेत्रफल 2,873.5 कि॰मी2वर्ग कि॰मी (1,109.5 वर्ग मील) है तो जनसंख्या 3,560,830 (2011)। साक्षरता दर 67.66 percentप्रतिशत और लिंगानुपात 955 है। यह एक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र है तो सात विधानसभा क्षेत्र—क्षेत्र- फाजिलनगर, खड्डा, रामकोला, हाटा, कसया, पडरौना, तमकुही राज हैं। जिले में 6 तहसीलें हैं - पडरौना, कुशीनगर, हाटा, तमकुहीराज , खड्डा, कप्तानगंज और 14 विकासखण्ड (block) हैं - पडरौना, बिशुनपुरा, कुशीनगर, हाटा, मोतीचक, सेवरही, नेबुआ नौरंगिया, खड्डा, दुदही, फाजिल नगर, सुकरौली, कप्तानगंज, रामकोला और तमकुहीराज। जिले में ग्रामों की संख्या 1446 हैं।
उत्तर प्रदेश के जिला् कुशीनगर का इतिहास
 
== नाम इतिहास ==
कुशीनगर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मंडल के अंतर्गत एक जनपद है। यह क्षेत्र पहले कुशीनारा के नाम से जाना जाता था जहां बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था। कुशीनगर जिले का प्रशासनिक प्रभाग पडरौना में है। क्षेत्रफल 2,873.5 कि॰मी2 (1,109.5 वर्ग मील) है तो जनसंख्या 3,560,830 (2011)। साक्षरता दर 67.66 percent और लिंगानुपात 955 है। यह एक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र है तो सात विधानसभा क्षेत्र— फाजिलनगर, खड्डा, रामकोला, हाटा, कसया, पडरौना, तमकुही राज हैं। जिले में 6 तहसीलें हैं - पडरौना, कुशीनगर, हाटा, तमकुहीराज , खड्डा, कप्तानगंज और 14 विकासखण्ड (block) हैं - पडरौना, बिशुनपुरा, कुशीनगर, हाटा, मोतीचक, सेवरही, नेबुआ नौरंगिया, खड्डा, दुदही, फाजिल नगर, सुकरौली, कप्तानगंज, रामकोला और तमकुहीराज। जिले में ग्रामों की संख्या 1446 हैं।
===धार्मिक व ऐतिहासिक परिचय===
हिमालय की तराई वाले क्षेत्र में स्थित कुशीनगर का इतिहास अत्यंतअत्यन्त ही प्राचीन व गौरवशाली है। वर्षइसी 1876स्थान ई0पर मेंमहात्मा अंग्रेज पुरातत्वविद ए कनिंघमबुद्ध ने आजमहापरिनिर्वाण केप्राप्त कुशीनगरकिया कीथा। खोज कीप्राचीन थी। खुदाईकाल में छठीयह शताब्दीनगर की[[मल्ल बनीवंश]] भगवानकी बुद्धराजधानी कीतथा लेटी16 प्रतिमामहाजनपदों मिलीमें थी।एक इसकेथा। अलावाचीनी रामाभारयात्री स्तूप[[ह्वेनसांग]] और और[[फाहियान]] माथाकुंवरके मंदिरयात्रा वृत्तातों में भी खोजेइस गएप्राचीन थे।नगर का उल्लेख मिलता है। [[वाल्मीकि रामायण]] के अनुसार यह स्थान [[त्रेता युग]] में भी आबाद था और यहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान [[राम]] के पुत्र [[कुश]] की राजधानी थी जिसके चलते इसे 'कुशावती' नाम से जाना गया। [[पालि साहित्य]] के ग्रंथ [[त्रिपिटक]] के अनुसार बौद्ध काल में यह स्थान षोड्श [[महाजनपद|महाजनपदों]] में से एक था। [[मल्ल राजवंश|मल्ल राजाओं]] की यह राजधानी तब 'कुशीनारा' के नाम से जानी जाती थी। पांचवी शताब्दी के अंतअन्त तक या छठी शताब्दी की शुरूआत में यहां भगवान बुद्ध का आगमन हुआ था। कुशीनगर में ही उन्होंने अपना अंतिम उपदेश देने के बाद महापरिनिर्माण को प्राप्त किया था।
 
इस प्राचीन स्थान को प्रकाश में लाने के श्रेय जनरल ए कनिंघम और ए. सी. एल. कार्लाइल को जाता है जिन्होंनें 1861 में इस स्थान की खुदाई करवाई। खुदाई में छठी शताब्दी की बनी भगवान बुद्ध की लेटी प्रतिमा मिली थी। इसके अलावा रामाभार स्तूप और और माथाकुंवर मंदिर भी खोजे गए थे। 1904 से 1912 के बीच इस स्थान के प्राचीन महत्व को सुनिश्चित करने के लिए [[भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण]] विभाग ने अनेक स्थानों पर खुदाई करवाई। प्राचीन काल के अनेक मंदिरों और मठों को यहां देखा जा सकता है।
धार्मिक व ऐतिहासिक परिचय
हिमालय की तराई वाले क्षेत्र में स्थित कुशीनगर का इतिहास अत्यंत ही प्राचीन व गौरवशाली है। वर्ष 1876 ई0 में अंग्रेज पुरातत्वविद ए कनिंघम ने आज के कुशीनगर की खोज की थी। खुदाई में छठी शताब्दी की बनी महात्मा बुद्ध की लेटी प्रतिमा मिली थी इसके अलावा रामाभार स्तूप और और माथाकुंवर मंदिर भी खोजे गए थे। वाल्मीकि रामायण के मुताबिक यह स्थान त्रेता युग में भी आबाद था और यहां मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पुत्र कुश की राजधानी थी जिसके चलते इसे कुशावती के नाम से जाना गया। पालि साहित्य के ग्रंथ त्रिपिटक के मुताबिक बौद्ध काल में यह स्थान षोड्श महाजनपदों में से एक था और मल्ल राजाओं की यह राजधानी। तब इसे कुशीनारा के नाम से जाना जाता था। पांचवी शताब्दी के अंत तक या छठी शताब्दी की शुरूआत में यहां महात्मा बुद्ध का आगमन हुआ था। कुशीनगर में ही उन्होंने अपना अंतिम उपदेश देने के बाद महापरिनिर्माण को प्राप्त किया था। कुशीनगर से 16 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में मल्लों का एक और गणराज्य पावा था। यहाँ बौद्ध धर्म के समानांतर ही जैन धर्म का प्रभाव था। माना जाता है कि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर जैन (जो बुद्ध के समकालीन थे) ने पावानगर (वर्तमान में फाजिलनगर) में ही परिनिर्वाण प्राप्त किया था। इन दो धर्मों के अलावा प्राचीन काल से ही यह स्थल हिंदू धर्मावलंम्बियों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। गुप्तकाल के तमाम अवशेष आज भी जिले में बिखरे पड़े हैं इनमें तकरीबन डेढ़ दर्जन प्राचीन टीले हैं जिसे पुरातात्विक महत्व का मानते हुए पुरातत्व विभाग ने संरक्षित घोषित कर रखा है। उत्तर भारत का इकलौता सूर्य मंदिर भी इसी जिले के तुर्कपट्टी में स्थित है। सूर्य की पहले से बनी प्रतिमा यहां खुदाई के दौरान ही मिली थी जो गुप्तकालीन मानी जाती है। इसके अलावा भी जनपद के विभिन्न हिस्सों में अक्सर ही जमीन के नीचे से पुरातन निर्माण व अन्य अवशेष मिलते ही रहते हैं। कुशीनगर जनपद का जिला मुख्यालय पडरौना है जिसके नामकरण के संबंध में हिंदू मत के मुताबिक यह कहा जाता है कि अयोध्या के राजा राम विवाह के उपरांत पत्नी सीता व अन्य सगे-संबंधियों के साथ इसी रास्ते जनकपुर से अयोध्या लौटे थे। उनके पैरों से रमित धरती पहले पदरामा और बाद में पडरौना के नाम से जानी गई। जनकपुर से अयोध्या लौटने के लिए राम और उनके साथियों ने पडरौना से 10 किलोमीटर पूरब से होकर बह रही बांसी नदी को पार किया था। आज भी बांसी नदी के इस स्थान को रामघाट के नाम से जाना जाता है। हर साल यहां भव्य मेला लगता है जहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार के लाखों श्रद्धालु आते हैं। बांसी नदी के इस घाट को स्थानीय लोग इतना महत्व देते हैं कि सौ काशी न एक बांसी की कहावत ही बन गई है। मुगल काल में भी यह जनपद अपनी खास पहचान रखता था।
 
कुशीनगर के करीब [[फाजिलनगर]] कस्बा है जहां के 'छठियांव' नामक गांव में किसी ने महात्मा बुद्ध को [[सूअर]] का कच्चा गोस्त खिला दिया था जिसके कारण उन्हें दस्त की बीमारी शुरू हुई और मल्लों की राजधानी कुशीनगर तक जाते-जाते वे निर्वाण को प्राप्त हुए। फाजिलनगर में आज भी कई टीले हैं जहां [[गोरखपुर विश्वविद्यालय]] के प्राचीन इतिहास विभाग की ओर से कुछ खुदाई का काम कराया गया है और अनेक प्राचीन वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। फिर भी अभी और खुदाई कराए जाने की आवश्यकता है। फाजिलनगर को पावापुरी भी कहा जाता है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि जैनधर्म की वास्तविक पावापुरी यही है न कि बिहार स्थिति पावापुरी। यही कारण है कि जैनियों द्वारा यहां पर जैन मंदिर का निर्माण भी कराया गया है। फाजिलनगर के पास ग्राम जोगिया जनूबी पट्टी में भी एक अति प्राचीन मंदिर के अवशेष हैं जहां बुद्ध की अतिप्रचीन मूर्ति खंडित अवस्था में पड़ी है। गांव वाले इस मूर्ति को 'जोगीर बाबा' कहते हैं। संभवत: जोगीर बाबा के नाम पर इस गांव का नाम जोगिया पड़ा है। जोगिया गांव के कुछ जुझारू लोग `लोकरंग सांस्कृतिक समिति´ के नाम से जोगीर बाबा के स्थान के पास प्रतिवर्ष मई माह में `लोकरंग´ कार्यक्रम आयोजित करते हैं जिसमें देश के महत्वपूर्ण साहित्यकार एवं सैकड़ों लोक कलाकार सम्मिलित होते हैं।
प्रमुख पर्यटन एवं ऐतिहासिक स्थल
कुशीनगर का परिनिर्वाण मंदिर
कुशीनगर में मुख्य रूप से महापरिनिर्वाण मंदिर, रामाभार स्तूप तथा माथाकुँवर मंदिर है। इसके अलावा जिले में मुख्य रूप से कुछ सांस्कृतिक तथा धार्मिक स्थान हैं। इस जिला में हिंदू धर्म के अतिरिक्त मुस्लिम समुदाय के लोग भी भारी संख्या में निवास करते हैं इस जिला में लगभग 30 बड़ी ज़मा मस्जिद के साथ बहुत सारी छोटी-बड़ी मस्जिद भी हैं। कुशीनगर के धरती को सूफी संतों की नगरी भी कहा जाता है। यहां इस्लाम धर्म के बहुत सारे औलिया ए कराम सूफियों के मजार वह दरगाह पाए जाते हैं। जिनमें ग्राम शाहपुर के बुढन शाह बाबा का दरग़ाह। पडरौना के समीप मलंग शाह बाबा का दरग़ाह। व पडरौना के गुमती शाह बाबा का दरग़ाह। रमज़ान शाह बाबा का दरग़ाह प्रमुख हैं। यहां शाहपुर के बुढन शाह बाबा के उर्स के मौके पर एक महीने के लिए बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है। जहां दूर दूर से लोग आते हैं।
 
जिला कुशीनगर आस्था के केंद्र के साथ साथ पर्यटन स्थल भी है। कुशीनगर के पनियहवा गंडक नदी पर बना पुल देखने में काफी रोचक लगता है।। पडरौना में बना बहुत पुराना राज़ दरबार भी पर्यटकों का दिल लुभाता है। कुशीनगर का सबसे बड़ा गांव जंगल खिरकिया में भब्य मंदिर है जहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। ग्राम जंगल अमवा के समीप मुसहर टोली में। बना पंचवटी पार्क भी देखने योग्य हैं।
इस जिला में शिक्षा का स्तर काफी तेजी से बढ़ रहा है। बहुत सारे कालेज व शैक्षिक संस्थान हैं। जिनमें बुद्धा डिग्री कॉलेज। उदित नारायण कालेज। किसान इंटर कॉलेज प्रमुख हैं।।।।।।इस जिला में कठकुईयां मील रामकोला मील पडरौना मील। खड्डा मील समेत कई बड़े चिनी मील फैक्ट्री मौजूद हैं। इस जिला में पडरौना। रामकोला।कठकुईयां। खड्डा।दूदही। तमकुही रोड़। पनियहवा समेत कई छोटे बड़े रेलवे स्टेशन हैं। कुशीनगर जिला का मुख्यालय रविन्द्र नगर धूस है। वर्तमान में कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट का काम प्रगति पर है
 
== नाम इतिहास ==
===धार्मिक व ऐतिहासिक परिचय===
हिमालय की तराई वाले क्षेत्र में स्थित कुशीनगर का इतिहास अत्यंत ही प्राचीन व गौरवशाली है। वर्ष 1876 ई0 में अंग्रेज पुरातत्वविद ए कनिंघम ने आज के कुशीनगर की खोज की थी। खुदाई में छठी शताब्दी की बनी भगवान बुद्ध की लेटी प्रतिमा मिली थी। इसके अलावा रामाभार स्तूप और और माथाकुंवर मंदिर भी खोजे गए थे। [[वाल्मीकि रामायण]] के अनुसार यह स्थान [[त्रेता युग]] में भी आबाद था और यहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान [[राम]] के पुत्र [[कुश]] की राजधानी थी जिसके चलते इसे 'कुशावती' नाम से जाना गया। [[पालि साहित्य]] के ग्रंथ [[त्रिपिटक]] के अनुसार बौद्ध काल में यह स्थान षोड्श [[महाजनपद|महाजनपदों]] में से एक था। [[मल्ल राजवंश|मल्ल राजाओं]] की यह राजधानी तब 'कुशीनारा' के नाम से जानी जाती थी। पांचवी शताब्दी के अंत तक या छठी शताब्दी की शुरूआत में यहां भगवान बुद्ध का आगमन हुआ था। कुशीनगर में ही उन्होंने अपना अंतिम उपदेश देने के बाद महापरिनिर्माण को प्राप्त किया था।
 
कुशीनगर से 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में मल्लों का एक और गणराज्य [[पावा]] था। यहाँ बौद्ध धर्म के समानांतर ही [[जैन धर्म]] का प्रभाव था। माना जाता है कि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर [[महावीर स्वामी]] ( जो बुद्ध के समकालीन थे) ने पावानगर (वर्तमान में [[फाजिलनगर]] ) में ही परिनिर्वाण प्राप्त किया था। इन दो धर्मों के अलावा प्राचीन काल से ही यह स्थल हिंदू धर्मावलंम्बियों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। गुप्तकाल के तमाम भग्नावशेष आज भी जिले में बिखरे पड़े हैं। लगभग डेढ़ दर्जन प्राचीन टीले हैं जिसे पुरातात्विक महत्व का मानते हुए पुरातत्व विभाग ने संरक्षित घोषित कर रखा है। उत्तर भारत का इकलौता [[सूर्य मंदिर]] भी इसी जिले के [[तुर्कपट्टी]] में स्थित है। भगवान [[सूर्य]] की प्रतिमा यहां खुदाई के दौरान ही मिली थी जो गुप्तकालीन मानी जाती है। इसके अलावा भी जनपद के विभिन्न हिस्सों में अक्सर ही जमीन के नीचे से पुरातन निर्माण व अन्य अवशेष मिलते ही रहते हैं।
कुशीनगर जनपद का जिला मुख्यालय पडरौना है जिसके नामकरण के संबंध में यह कहा जाता है कि भगवान राम के विवाह के उपरांत पत्नी सीता व अन्य सगे-संबंधियों के साथ इसी रास्ते [[जनकपुर]] से अयोध्या लौटे थे। उनके पैरों से रमित धरती पहले पदरामा और बाद में पडरौना के नाम से जानी गई। जनकपुर से अयोध्या लौटने के लिए भगवान राम और उनके साथियों ने पडरौना से 10 किलोमीटर पूरब से होकर बह रही [[बांसी नदी]] को पार किया था। आज भी बांसी नदी के इस स्थान को 'रामघाट' के नाम से जाना जाता है। हर साल यहां भव्य मेला लगता है जहां यूपी और बिहार के लाखों श्रद्धालु आते हैं। बांसी नदी के इस घाट को स्थानीय लोग इतना महत्व देते हैं कि 'सौ काशी न एक बांसी' की कहावत ही बन गई है। मुगल काल में भी यह जनपद अपनी खास पहचान रखता था।
 
== नगर ==
{{बौद्ध धार्मिक स्थल}}
अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन केन्द्र के रूप में विख्यात कुशीनगर उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण नगर है। इसी स्थान पर महात्मा बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। कुशीनगर को कसया या कुशीनगर नाम से भी जाना जाता है। गोरखपुर से महज 53 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह नगर एक जमाने में मल्ल वंश की राजधानी थी। साथ ही कुशीनगर प्राचीनकाल के 16 महाजनपदों में एक था। चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाहियान के यात्रा वृत्तातों में भी इस प्राचीन नगर का उल्लेख मिलता है। इस प्राचीन स्थान को प्रकाश में लाने के श्रेय जनरल ए कनिंघम और ए. सी. एल. कार्लाइल को जाता है जिन्होंनें 1861 में इस स्थान की खुदाई करवाई। 1904 से 1912 के बीच इस स्थान के प्राचीन महत्व को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने अनेक स्थानों पर खुदाई करवाई। प्राचीन काल के अनेक मंदिरों और मठों को यहां देखा जा सकता है।
 
कुशीनगर के करीब फाजिलनगर कस्बा है जहां के 'छठियांव' नामक गांव में किसी ने महात्मा बुद्ध को सूअर का कच्चा गोस्त खिला दिया था जिसके कारण उन्हें दस्त की बीमारी शुरू हुई और मल्लों की राजधानी कुशीनगर तक जाते-जाते वे निर्वाण को प्राप्त हुए। फाजिलनगर में आज भी कई टीले हैं जहां [[गोरखपुर विश्वविद्यालय]] के प्राचीन इतिहास विभाग की ओर से कुछ खुदाई का काम कराया गया है और अनेक प्राचीन वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। फिर भी अभी और खुदाई कराए जाने की आवश्यकता है। फाजिलनगर को पावापुरी भी कहा जाता है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि जैनधर्म की वास्तविक पावापुरी यही है न कि बिहार स्थिति पावापुरी। यही कारण है कि जैनियों द्वारा यहां पर जैन मंदिर का निर्माण भी कराया गया है। फाजिलनगर के पास ग्राम जोगिया जनूबी पट्टी में भी एक अति प्राचीन मंदिर के अवशेष हैं जहां बुद्ध की अतिप्रचीन मूर्ति खंडित अवस्था में पड़ी है। गांव वाले इस मूर्ति को जोगीर बाबा कहते हैं। संभवत: जोगीर बाबा के नाम पर इस गांव का नाम जोगिया पड़ा है। जोगिया गांव के कुछ जुझारू लोग `लोकरंग सांस्कृतिक समिति´ के नाम से जोगीर बाबा के स्थान के पास प्रतिवर्ष मई माह में `लोकरंग´ कार्यक्रम आयोजित करते हैं जिसमें देश के महत्वपूर्ण साहित्यकार एवं सैकड़ों लोक कलाकार सम्मिलित होते हैं।
 
==मैत्रेय-बुद्ध परियोजना==
[[चित्र:Kusinara.jpg|right|thumb|150px|परिनिर्वाण स्तूप एवं मंदिर]]
महानिर्वाण या निर्वाण मंदिर कुशीनगर का प्रमुख आकर्षण है। इस मंदिर में महात्मा बुद्ध की 6.10 मीटर लंबी प्रतिमा स्थापित है। 1876 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी। यह सुंदर प्रतिमा चुनार के बलुआ पत्थर को काटकर बनाई गई थी। प्रतिमा के नीचे खुदे अभिलेख के पता चलता है कि इस प्रतिमा का संबंध पांचवीं शताब्दी से है। कहा जाता है कि हरीबाला नामक बौद्ध भिक्षु ने गुप्त काल के दौरान यह प्रतिमा मथुरा से कुशीनगर लाया था।
{{बौद्ध धर्म}}
 
=== माथाकौरमाथाकुंवर मंदिर ===
{{बौद्ध धर्म}}
=== माथाकौर मंदिर ===
यह मंदिर निर्वाण स्तूप से लगभग 400 गज की दूरी पर है। भूमि स्पर्श मुद्रा में महात्मा बुद्ध की प्रतिमा यहां से प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा बोधिवृक्ष के नीचे मिली है। इसके तल में खुदे अभिलेख से पता चलता है कि इस मूर्ति का संबंध 10-11वीं शताब्दी से है। इस मंदिर के साथ ही खुदाई से एक मठ के अवशेष भी मिले हैं।
 
कुशीनगर में खुदाई से प्राप्त अनेक अनमोल वस्तुओं को बौद्ध संग्रहालय में संरक्षित किया गया है। यह संग्रहालय इंडो-जापान-श्रीलंकन बौद्ध केन्द्र के निकट स्थित है। आसपास की खुदाई से प्राप्त अनेक सुंदर मूर्तियों को इस संग्रहालय में देखा जा सकता है। यह संग्रहालय सोमवार के अलावा प्रतिदिन सुबह 10 से शाम 5 बजे तक खुला रहता है।
 
इन दर्शनीय स्थलों के अलावा क्रिएन मंदिर, शिव मंदिर, राम -जानकी मंदिर, मेडिटेशन पार्क, बर्मीजबर्मी मंदिर आदि भी कुशीनगर में देखे जा सकते हैं
 
===अन्य===
जिला कुशीनगर आस्था के केंद्र[[पनियहवा]] के साथ साथ पर्यटन स्थल भी है। कुशीनगर के पनियहवामें [[गंडक नदी]] पर बना पुल देखने में काफी रोचक लगता है।।है। पडरौना में बनाका बहुत पुराना राज़राज दरबार भी पर्यटकों का दिल लुभाता है। कुशीनगर का सबसे बड़ा गांव जंगल खिरकिया में भब्य मंदिर है जहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। ग्राम जंगल अमवा के समीप मुसहर टोली में।में बना पंचवटी पार्क भी देखने योग्य हैं।
 
इस जिलाजिले में शिक्षा का स्तर काफी तेजी से बढ़ रहा है। बहुत सारे कालेज व शैक्षिक संस्थान हैं। जिनमें बुद्धाबुद्ध डिग्री कॉलेज।कॉलेज, उदित नारायण कालेज।कालेज, किसान इंटर कॉलेज प्रमुख हैं।।।।।।इसहैं। इस जिला में कठकुईयां मीलचीनी मिल, रामकोला मीलचीनी मिल, पडरौना मील।चीनी मिल, खड्डा मीलचीनी मिल समेत कई बड़े चिनीचीनी मील फैक्ट्री मौजूदमिल हैं। इस जिलाजिले में पडरौना।[[पडरौना]], रामकोला।कठकुईयां। खड्डा।दूदही।[[रामकोला]], [[कठकुईयां]], [[खड्डा]], [[दुदही]], [[तमकुही रोड़।रोड]], [[पनियहवा]] समेत कई छोटे बड़े रेलवे स्टेशन हैं। कुशीनगर जिला का मुख्यालय रविन्द्ररवीन्द्र नगर धूस है। वर्तमान में कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट का काम प्रगति पर है
 
=== लोकरंग ===
लोकरंग सांस्कृतिक समिति´ विगत तीन वषों से लोक संस्कृतियों के अन्वेषण, संवर्धन और संरक्षण की दिशा में कार्य कर रही है। किसी भी समाज की लोक संस्कृति, कला और संगीत का उसके मानवीय संवेदनाओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान होता है। हम असीम लिप्सा, धूर्तता, पाखण्ड से आवृत परिवेश में जी रहे हैं, जहां ठहर कर लोकसंस्कृतियों की हिफाजत के लिए वक्त नहीं है। ऐसे में हमारी लोक संस्कृतियां समाप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। इन्हीं चिन्ताओं को केंन्द्र में रखकर `लोकरंग सांस्कृतिक समिति´ ने ग्राम-जोगिया जनूबी पट्टी, फाजिलनगर, कुशीनगर के ग्रामीण इलाके में हस्तक्षेप किया है। `लोकरंग 2008´ के माध्यम से हमने प्रयास किया था कि पूर्वांचल के, देवीगीत, हुड़का, पखावज, फरी नृत्य, विविध लोकगीतों और नुक्कड़ नाटकों को एक मंच पर लाया जाए और इस दिशा में हम सफल भी हुए थे। `लोकरंग 2009´ में हमने चइता, बिरहा, जोगीरा, कहरवा, कबीर, कजरी और निर्गुन गायकी, एकतारा वादन, जांघिया, धोबियाऊ और फरी नृत्य, विविध लोकगीतों और नाटकों को मंच प्रदान किया। दोनों ही वर्ष हमने विचार गोष्ठियों का आयोजन किया जिनमें देश के महत्वपूर्ण साहित्यकार और लोक कलाकार सम्मिलित हुए।
`'लोकरंग-2010´' में पंवरिया, पखावज, हुड़का और अहिरऊ नृत्य, छत्तीसगढ़ी लोकगीत, बुन्देलखण्डी अचरी, बृजवासी, ईसुरी फाग एवं आल्हा गायकी को स्थान दिया गया है। भोजपुरी गीतों को मंच प्रदान करने के लिए तमाम लोक गायकों को आमन्त्रित किया गया है। हमारा प्रयास होगा कि `लोकरंग 2010´ लोकसंगीत /संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।
 
== आवागमन ==