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लेकिन अब हरिजन शब्द को प्रतिबन्धित कर दिया गया है! हरिजन शब्द के स्थान पर अनुसूचित जाति का स्तेमाल करना अनिवार्य कर दिया गया है !
 
हरिजन शब्द [[पाकिस्तान]] के दलितों के लिये भी प्रयुक्त होता है जिन्हें '''हरी''' कहा जाता है और जो मिट्टी के झोपड़े बनाने के लिये जाने जाते हैं।
 
जैसा की हमलोग सभी भली भांति जानते हैं , भारतीय इतिहास का पहला जानकर अलबेरुनी को कहा जाता हैं ,जो १०१७-१०२० (1017-1020)  ईस्वी के मध्य महमूद गजनवी के सेना के साथ भारत आया था अलबेरुनी जोतिष शास्त्री , दार्शानिक के साथ साथ महान लेखक भी था , उन्होंने भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता पर तहक़ीक़ ए हिन्द नमक पुस्तक मैं भारतीय हिन्दुओ का इतिहास , चरित्र , आचार - व्यवहार ,  परम्पराये, आदि ज्ञान का  विशाद वर्णन किया , उन्होंने यहाँ के हिन्दू वर्ण व्यवस्था  का बिस्तर पूर्ण रूप से समझा और लिखा ,
 
अलबेरुनी ने देखा , यहाँ मौजूद हिन्दू वर्ण व्यवस्था मुख्यत चार भागो मैं बटी थी पर इसका मतलब ये नहीं की हिन्दू सिर्फ चार भाग या चार वर्ण मैं थी , उस समाज का एक वर्ण ऐसा भी था जिन्हे जाति या वर्ण व्यवस्था से अलग रख गया था उस वक़्त वर्ण व्यवस्था के अंतर्गर्त ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य एवं शुद्र होते थे जो अपने वंशावत पेशे के आधार पर बटे थे | उन्होंने उस अमानवीय व्यवस्था का वर्णन भी विस्तार से किया जिसे आज तक पता नहीं हैं की मैं कौन हूँ ? और कहा से हमारे पुरवज होंगे ?
 
यह सवाल आज ईकस्वी सदी तक एक गुमनाम सवाल के तरह खामोश हैं , जिसका भारत देश मैं कोई इतिहास नहीं मिलता , क्यों की वो लोग जिन्हे सत्ता , शासन , और झूठी सान प्यारी थी कभी छन भर के लिए भी नहीं सोचा
 
वैसे जातियों में एक जाति है हाडी जाति जो भारत में अति प्राचीन जाति के रूप में सदियों से समाज एवं समाज की सड़कों , नालियों, आदि की साफ सफाई रखने की जिम्मा उठाये हुए हैं , अर्थात वह जाति जो समाज के सबसे निचले पायदान में आती है जिनका सामाजिक पेशा मैला साफ करने का रहा है , इस तरह के पेशे से जुड़े होने के कारण समाज सदियों से इस समुदाय के लोगों को घृणापूर्ण दृष्टी से देखती आ रही है I वह समाज जो सदियों से हमारे पर्यावरण, परिवेश , घर – मकान , सड़क इत्यादि को साफ करते आ रहे हैं और अन्य लोगों को स्वच्छ परिवेश में जीने के लिये अपनी जिंदगी दाव पर लगते आ रहे हैं बावजूद इसके लोग इन्हे सम्मान पूर्वक नहीं देखते I
 
भारत में हाडी जाति मूलतः बंगाल ,बिहार , झारखण्ड , ओड़िसा, छत्तीसगढ़ , उत्तरप्रदेश, असम में अधिक जनसंख्या में पाई जाती है, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश , गुजरात , हरियाणा, अंडमान निकोबार तथा अन्य राज्यों में हाड़ी जाति की जनसंख्या बहुत कम पाई जाती है I इसके अलावा हाडी जाति के लोग '''नेपाल एवम बांग्लादेश''' में भी मौजूद है I इस समुदाय के अधिकतर जनसंख्या आज भी पेशा के रूप में साफ सफाई को अपनाये हुए है I  इस समुदाय की जनसंख्या को विश्व के मानचित्र में निचे दिए गए तस्वीर के माध्यम से (चित्र सं. 1.1) दर्शाया गया है Iयह जाति मूल रूप से एशिया महादेश मैं पाई जाती है जो मूल रूप से हिन्दू ('''''Antyajas''''' or Untouchable) जनजाति हैं
 
अल बेरुनी ने अपने पुस्तक मैं यह भी वर्णन किया के इनलोगों को नगर समाज, गॉव इत्यादि से बाहर रखा जाता था ये हिन्दू होने के वावजूद हिन्दू वर्ण व्यवस्था से अलग रखी गई थी , इनके निवास स्थानों को किसी सांकेतिक रूप से चिंहित किया जाता था ताकि कोई अन्य वर्ण के लोग इनके स्पर्स न हो सके , उन्होंने अपनी पुस्तक मैं '''अस्पृश्य''' श्रेणी मैं आने वाले अन्य जाति डोम , चांडाल का भी संयुक्त वर्णन किया |
 
अल बेरुनी के माध्यम से यह स्पष्ट होता हैं की ये जातिया मूल रूप से भारतीय जनजातियों की श्रेणी मैं आती हैं और जो मूलतः हिन्दू जनजाति ही हैं                  
 
भारत मे साम्राज्यवाद के समय जब एक राजा अपने पडोशी राजा के साथ सम्बन्ध स्थापित करते अर्थात एक राजा अपने पुत्र – पुत्री का शादी विवाह अन्य राजाओं के पुत्र – पुत्री के साथ कराते थे ,उस वक्त राजा अपने पुत्री के साथ नौकर चाकर ,लावा लस्कर भी भेजा करते थे  भारत के बंगाल क्षेत्र के मूल जन जाति हाडी या हरि जाति के लोग वहा से अन्य जगह विस्थापित कर दुसरे राज्यों एव नगरों मैं बसाये गए , इस तरह हाडी जाति के लोग भारत और भारत के आस पास वाले देशों मैं जा कर बस गए |  यही कारण  हाडी जाति के लोगो की संख्या कही अधिक तो कही कम पई जाती हैं इस जाति के लोग मूल रूप से वर्दमान ,मानभूम क्षेत्र के मूल निवासी एव मूल जनजाति हैं हाडी जाति के लोगो मूल पेशा साफ़ सफाई का है
 
भारत मैं इस जाति के लोग आपने नाम के बाद उपनाम के रूप मैं हाडी ,हरि , हरिजन , मेहतर , सहिस , राम , हाजरा ,मुखी , केवडा , इत्यादि लिखते हैं ,
 
आज के आधुनिक समय मैं भी हमारा समाज लगभग एक लाख वर्षो से भी अधिक पुराना रीति रिवाज परम्परा एवं सभ्यता को सामाजिक माध्यम से एक दूसरे को जोड़ी रखी हैं , हमारे परम्पराएं एवं सभ्यता को देख कर कोई भी इसकी आकलन आसानी से कर सकता हैं
 
१-      शादियों से चली आ रहे प्रथा जिसमे ब्राह्मण समाज अपने श्रेष्टता की बात करते आये हैं  हमारे समाज के लोग जब कभी शादी विवाह करते हैं , हमारे पूर्वज समाज के ऐसे वक्तियो को नहीं बुलाते
 
२-      आज के आधुनिक समय मैं भी हमारा समाज लगभग एक लाख वर्षो से भी अधिक पुराना रीति रिवाज , जिव जंतु , पेड़ पोधा, जल खाद्य सामाग्री एव प्राकृतिक सम्पदा का '''संरक्षण''' ( अर्थात '''उनकी पूजा करना'''  )
 
३-      परम्परा एवं सभ्यता को सामाजिक माध्यम से एक दूसरे को जोड़ी रखी हैं , हमारे परम्पराएं एवं सभ्यता को देख कर कोई भी इसकी आकलन आसानी से कर सकता हैं
 
४-      १- शादियों से चली आ रहे प्रथा जिसमे ब्राह्मण समाज अपने श्रेष्टता की बात करते आये हैं एक वक़्त था जब वे लोग हमारे घर , गांव , मोहल्ला से  और तो और हमरे शरीर से भी दूर भागते थे , वे हमारे समाज से इतने घ्रिणा करते   हमारे समाज के लोग जब कभी शादी विवाह करते हैं , हमारे पूर्वज समाज के ऐसे वक्तियो को नहीं बुलाते थे
 
== गांधीजी के प्रकाशन ==
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