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(पण्डितलक्षणम्)
 
; महापुरुष के लक्षण
 
; विद्वान के लक्षण
: ''सत्यं तपो ज्ञानमहिंसता च विद्वत्प्रणामंच सुशीलता च।
: ''एतानि योधारयते स विद्वान् न के वलंयः पठते स विद्वान्॥
: सत्य, तप (अपने धर्म से न डिगना) ज्ञान, अहिंसा (किसी का दिल न दुखाना) विद्वानों का सत्कार, शीलता, इनको जो धारण करता है वह विद्वान् है केवल पुस्तक पढ़ने वाला नहीं।
 
: ''शास्त्रारायधीत्यपि भवन्तिमूर्खायस्तु क्रियावान् पुरुषः सविद्वान्।
: ''सुचिन्तितंचौषध मातुराणाँ न नाममात्रेण हरोत्यरोगम्॥
: शास्त्र पढ़ कर भी मूर्ख रहते हैं परन्तु जो शास्त्रोक्त क्रिया को करने वाला है वह विद्वान् है। रोगी को नाम मात्र से ध्यान की हुई औषधि निरोग नहीं कर सकती।
 
; बुद्धि के लक्षण
: ''ऊहापोहोऽर्थ विज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः ॥
: शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, चिंतन, उहापोह, अर्थविज्ञान, और तत्त्वज्ञान – ये बुद्धि के गुण हैं ।
 
; मित्र के लक्षण
 
गुसाई [[तुलसीदास]] जी सन्मित्र के लक्षण इस प्रकार कथन करते हैं :—
 
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।
 
तिनहिं विलोकत पातक भारी॥
 
जिन दुख गिरिसम रज करजाना।
 
मित्र के दुख रज मेरु समाना॥
 
जिनके असमति सहज न आई।
 
ते शठ कत हठि करत मिताई॥
 
देत लेत मन संक न धरईं।
 
बल अनुमान सदा हित करईं॥
 
कुपथ निवारि सुपथ चलावा।
 
गुण प्रगटइ अवगुणहिं दुरावा॥
 
विपत्ति काल कर सतगुन नेहा।
 
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥