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== संक्षेप ==
इस कहानी की शुरुआत अशोक ([[धर्मेन्द्र]]), विनोद ([[विनोद खन्ना]]) और रणधीर के बचपन से शुरू होती है। उन सभी का भारत में बहुत ही तेज ट्रेन बनाने और चलाने का सपना होता है। उनके बड़े होने के बाद एक दिन भारतीय रेलवे एक बहुत ही तेज ट्रेन "सुपर एक्सप्रेस" बनाने की अनुमति देती है। विनोद, रणधीर और राकेश अपना अपना मॉडल चुनाव हेतु भेजते हैं, लेकिन अंत में विनोद का दिया मॉडल ही चुना जाता है। रणधीर को अपने मॉडल के न चुने जाने से गुस्सा आ जाता है और वो इसका बदला लेने की सोचता है। लगभग 6 साल गुजर जाते हैं और विनोद अपनी ट्रेन बनाने के काम में लगा रहता है और अंत में पूरा भी कर लेता है, जिससे लोग बस 14 घंटे में ही दिल्ली से मुंबई में जा सकते हैं।
 
ट्रेन के पहली बार चलने का समय भी आ जाता है और वो ट्रेन दिल्ली से मुंबई जाने के लिए मथुरा स्टेशन से निकल जाती है। अशोक की मुलाक़ात रणधीर से होती है, वे दोनों बात करते रहते हैं कि रणधीर उसे बताता है कि उसने बदला लेने के लिए ट्रेन के ब्रेक को हटा दिया है और इंजन में बम भी रख दिया है। ये बात जान कर अशोक तुरंत ट्रेन की ओर जाता है, पर उससे पहले ही ट्रेन में धमाका हो जाता है और ड्राइवर की मौत हो जाती है। इसके बाद ट्रेन बिना रुके आगे बढ़ते जाती है।
 
रेलवे में काम करने वालों को ये बात पता चलती है तो उनके होश उड़ जाते हैं। राकेश, जो मुंबई में रहता है, वो ट्रेन को धीमा करने की कोशिश करते रहता है। वहीं अशोक और राकेश की मदद से विनोद एक कार से ट्रेन में जाने की कोशिश करता है। विनोद, अशोक और रवि उस इंजन में आ जाते हैं और वहाँ रणधीर को देख कर हैरान रह जाते हैं। रणधीर उन्हें मारने की कोशिश करते रहता है, पर मारपीट के दौरान वो ट्रेन से गिर जाता है। वे लोग इंजन में देखते हैं कि सारा सिस्टम तबाह हो चुका है और उसे पूरी तरह उड़ाने के अलावा और कोई चारा नहीं है। रवि सारे यात्रियों को सीट में अच्छी तरह कस कर बैठने बोलता है, ताकि बम के धमाके के कारण उन्हें चोट न लग जाये। इसके बाद वे लोग डाइनामाइट से विस्फोट करते हैं। अंत में इंजन धीमा हो जाता है और सारे यात्री बॉम्बे रेलवे स्टेशन में उतर जाते हैं और इसी के साथ कहानी समाप्त हो जाती है।
 
== मुख्य कलाकार ==