मुख्य मेनू खोलें

बदलाव

203 बैट्स् जोड़े गए ,  11 माह पहले
सम्पादन सारांश रहित
 
== परिचय ==
समाज उपयोगी शिक्षा का सामान्य अर्थ है ' वातावर्ण स्वच्छ रखना' से है
समाज मानवीय अंत:क्रियाओं के प्रक्रम की एक प्रणाली है। मानवीय क्रियाएँ चेतन और अचेतन दोनों स्थितियों में साभिप्राय होती हैं। व्यक्ति का व्यवहार कुछ निश्चित लक्ष्यों की पूर्ति के प्रयास की अभिव्यक्ति है। उसकी कुछ नैसर्गिक तथा अर्जित आवश्यकताएँ होती हैं। जैसे काम, क्षुधा, सुरक्षा आदि। इन अवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में व्यक्ति में कुंठा और मानसिक तनाव से ग्रसित हो जाता है। वह इनकी पूर्ति स्वयं करने में सक्षम नहीं होता है। अत: इन आवश्यकताओं की सम्यक् संतुष्टि के लिए अपने दीर्घ विकास क्रम में मनुष्य ने एक समष्टिगत व्यवस्था को विकसित किया है। इस व्यवस्था को ही हम समाज के नाम से सम्बोधित करते हैं। यह व्यक्तियों का ऐसा संकलन है जिसमें वे निश्चित संबंध और विशिष्ट व्यवहार द्वारा एक दूसरे से बँधे होते हैं। व्यक्तियों की वह संगठित व्यवस्था विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न मानदंडों को विकसित करती है, जिनके कुछ व्यवहार अनुमन्य और कुछ निषिद्ध होते हैं।
 
समाज मानवीसमाज मानवीय अंत:क्रियाओं के प्रक्रम की एक प्रणाली है। मानवीय क्रियाएँ चेतन और अचेतन दोनों स्थितियों में साभिप्राय होती हैं। व्यक्ति का व्यवहार कुछ निश्चित लक्ष्यों की पूर्ति के प्रयास की अभिव्यक्ति है। उसकी कुछ नैसर्गिक तथा अर्जित आवश्यकताएँ होती हैं। जैसे काम, क्षुधा, सुरक्षा आदि। इन अवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में व्यक्ति में कुंठा और मानसिक तनाव से ग्रसित हो जाता है। वह इनकी पूर्ति स्वयं करने में सक्षम नहीं होता है। अत: इन आवश्यकताओं की सम्यक् संतुष्टि के लिए अपने दीर्घ विकास क्रम में मनुष्य ने एक समष्टिगत व्यवस्था को विकसित किया है। इस व्यवस्था को ही हम समाज के नाम से सम्बोधित करते हैं। यह व्यक्तियों का ऐसा संकलन है जिसमें वे निश्चित संबंध और विशिष्ट व्यवहार द्वारा एक दूसरे से बँधे होते हैं। व्यक्तियों की वह संगठित व्यवस्था विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न मानदंडों को विकसित करती है, जिनके कुछ व्यवहार अनुमन्य और कुछ निषिद्ध होते हैं।
 
समाज में विभिन्न कर्ताओं का समावेश होता है, जिनमें अंत:क्रिया होती है। इस अंत:क्रिया का भौतिक और पर्यावरणात्मक आधार होता है। प्रत्येक कर्ता अधिकतम संतुष्टि की ओर उन्मुख होता है। सार्वभौमिक आवश्यकताओं की पूर्ति समाज के अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। तादात्म्यजनित आवश्यकताएँ संरचनात्मक तत्वों के सहअस्तित्व के क्षेत्र का नियमन करती
बेनामी उपयोगकर्ता