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'''मेरा नाम जोकर''' 1970 में बनी [[हिन्दी भाषा]] की फिल्म है।
 
== कथानकसंक्षेप ==
ये कहानी राजू नाम के एक जोकर की है, जिसे सर्कस का सबसे अच्छा जोकर समझा जाता है। राजू के पिता की मौत सर्कस में एक करतब दिखाते समय होती है, इस कारण राजू की माँ उसे कभी भी सर्कस में काम नहीं करने देती है। राजू ([[ऋषि कपूर]]) को बचपन में ही अपनी शिक्षिका, मेरी (सिमी गड़ेवाल) से प्यार हो जाता है। पर वो उससे काफी बड़ी रहती है और उसकी शादी हो जाती है। इस कारण उसका दिल टूट जाता है पर उसे ये भी एहसास होता है कि वो पूरी दुनिया को हंसाने के लिए बना है।
इस फ़िल्म की कहानी का आरंभ वस्तुतः कहानी के लगभग अंतिम स्थिति से होता है। फ़िल्म का नायक राजू (जोकर) अपने जीवन में आने वाली, हार्दिक रूप से जुड़ने वाली और बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाली तीन स्त्रियों को पत्र भेजता है अपना अंतिम तमाशा देखने के लिए आने के निमंत्रण के रूप में। फिर जैमिनी सर्कस के अंतर्गत राजू जोकर के जीवन का आखिरी तमाशा आरंभ होता है सर्कस के मालिक महेन्द्र (धर्मेन्द्र) की इस घोषणा से कि हम सबका प्यारा जोकर राजू आज 20 वर्षों बाद अपने जीवन का आखिरी तमाशा पेश करने जा रहा है। इन 20 वर्षों में वह सुखी रहा या दुखी और कहाँ रहा इसका पता किसी को नहीं है। फिर दृश्य आरंभ होता है राजू जोकर के ऑपरेशन से, जिसमें डॉक्टरों की एक टीम मजाकिया लहजे में उसका ऑपरेशन करके उसका दिल निकालता है और वजह यह बताया जाता है कि उसको एक खतरनाक बीमारी है। बीमारी यह है कि उसका दिल इतना बड़ा है कि उसमें सारी दुनिया समा सकती है। दिल बड़ा और दुनिया छोटी, यह बहुत खतरनाक बीमारी है। यहीं से सहज रूप में मनोरंजन के साथ जीवन-दर्शन प्रकट होने लगता है। ऑपरेशन के बाद जो उसका दिल निकलता है वह एक से दूसरे हाथ में जाते हुए बढ़ने लगता है। राजू यह जानकर बहुत खुश होता है कि उसका दिल बड़ा है और वह खुशी से नाचने-गाने लगता है -- 'जीना यहाँ, मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ'। इसी क्रम में ऊपर उछल कर उसका दिल नीचे गिरकर टूटता है और उसमें उसे अपने विगत जीवन की याद झलकती है-- उसके जीवन में उसकी माता के अतिरिक्त पहली बार प्रेम लेकर आयी महिला मैरी () का चेहरा दिखने के रूप में। उस चेहरे को देखते हुए राजू अपने विगत जीवन में खो जाता है और फिल्म की कहानी वस्तुतः आरंभ हो जाती है। किशोरावस्था में एक गरीब परिवार का राजू, जिसमें उसके साथ केवल उसकी माँ है, एक क्रिश्चियन स्कूल में पढ़ता है। वहां एक नयी टीचर आने वाली रहती है जिसका एक खूसट बुढ़िया के रूप में आड़ा-तिरछा रेखाचित्र राजू ब्लैकबोर्ड पर बना देता है और मजाक उड़ाता है। लेकिन जब टीचर आती है तो वह सभी बच्चों से आत्मीयता स्थापित कर लेती है। एक दिन व्यायाम करते हुए राजू की पैंट पीछे से फट जाती है और टीचर उसकी मरम्मत करने के क्रम में उससे उसके पिता के बारे में पूछती है जो कि राजू को मालूम नहीं रहता है। घर जाकर वह हठ पूर्वक माँ से पिता के बारे में पूछता है; तब उसकी मां भावुक और कुछ क्रोधित होकर आलमारी से जोकर की एक खिलौना टाइप मूर्ति निकाल कर पटक देती है और कहती है कि तुम्हारे पिताजी ये थे 'जोकर'। उसे देखकर राजू काफी खुश होता है और कहता है पिताजी भी जोकर थे ! मैं भी उन्हीं की तरह जोकर बनूंगा। इस पर उसकी मां उसे तमाचा जड़ देती है और कहती है खबरदार जो कभी जोकर बनने का नाम लिया! वह बताती है कि उसके पिताजी सर्कस में काम किया करते थे। लोगों को भरपूर हंसाते थे। सर्कस ही उनकी जिंदगी थी और वहीं उनकी मौत हुई। हमेशा गाते रहते थे 'जीना यहां मरना यहां इसके सिवा जाना कहां'। राजू उस समय मां के डर से चुप रह जाता है लेकिन जोकर बनने की बात उसके मन में समा जाती है। परिस्थितियां कुछ ऐसी होती है कि किशोरावस्था के स्वाभाविक यौवनाकर्षण के कारण राजू एक दिन वस्त्र बदलती हुई अपनी टीचर को देखता है और उसके प्रति आकर्षित होता है। लेकिन शीघ्र ही उसे एहसास होता है कि यह उसके द्वारा पाप हुआ है और वह चर्च में जाकर ईसा मसीह के सामने कन्फेशन करता है (अपना पाप स्वीकारता है)। फिर स्कूल में छुट्टी होती है। राजू अपनी टीचर को विदा करने ट्रेन तक जाता है और उसे अपनी जोकर वाली मूर्ति देता है, यह कह कर कि यह मैं हूँ, इसे हमेशा संभाल कर रखिएगा। राजू के लिए सारे सहपाठी एवं टीचर के चले जाने के कारण यह पूरा समय काफी खाली-खाली और सूना-सूना है और जब छुट्टियां खत्म होती है तो वह टीचर के आ जाने के कारण बेहद खुश होता है। लेकिन जब उसे पता चलता है कि टीचर के साथ उसके प्रेमी डेविड (मनोज कुमार) भी हैं तो वह उदास हो जाता है। गरीबी के कारण राजू जोकर का तमाशा दिखाकर पैसा बटोरता है स्कूल की फी भरने के लिए। लेकिन इस बात का स्कूल में पढ़ने वाले अन्य बच्चों के अभिभावक पर बुरा प्रभाव पड़ने, अर्थात बुरा मानने की आशंका से क्रिश्चियन स्कूल का संचालक जो कि स्थानीय चर्च का पादरी है, राजू को स्कूल से निकाल देता है। इस बीच एक दिन बातों-बातों में डेविड उसे बताता है कि जोकर होना कोई आसान काम नहीं है और अपने लिए जोकर सुनकर वह गुस्सा न करे, क्योंकि जोकर स्वयं दुखी रह कर भी दूसरों को खुश रखता है। वह वस्तुतः दूसरों के लिए जीता है। इसलिए सबसे बड़ा जोकर वस्तुतः ईश्वर हैं, क्योंकि वे अपने लिए कुछ नहीं करते। जो कुछ करते हैं दूसरों के लिए ही।
 
बड़े होने के बाद राजू ([[राज कुमार]]) को जेमिनी सर्कस में काम मिल जाता है। वो सर्कस महेन्द्र सिंह ([[धर्मेन्द्र]]) का होता है, जो राजू के क्षमता को अच्छी तरह जानते रहता है और उसे काम पर रख लेता है। सर्कस में रूस से कलाकारों का एक समूह आता है, उनमें से एक लड़की, मरीना (क्सेनिया रियाबिंकीना) से राजू को प्यार हो जाता है। राजू को लगते रहता है कि वे दोनों साथ रहेंगे, पर सर्कस के खत्म हो जाने के बाद मरीना वापस रूस चले जाती है, जिससे राजू का दिल फिर टूट जाता है। इसी दौरान सर्कस में राजू की माँ भी राजू के करतब देखते रहती है और उसे अपने पति के मौत याद आ जाती है, उसी तरह के करतब अपने बेटे को करते देख उसकी मौत हो जाती है।
स्कूल से निकाले जाने के बाद राजू दुखी होकर ईसा मसीह के पास अपने दुख की भावना व्यक्त करता रहता है तभी उसकी टीचर भी सूचित करती है कि वह भी छुट्टी पर जा रही है और राजू को अपने विवाह में सम्मिलित होने का निमंत्रण देती है। विवाह होते वक्त राजू बेस्ट मैन (सबसे करीबी दोस्त) बनता है और इस हक से डेविड उसे ही रिवाज के तहत अपनी पत्नी मैरी (राजू की टीचर) को चूमने के लिए कहता है। राजू अंतर्द्वंद महसूस करते हुए चूमता है। डेविड राजू को उसी के द्वारा मैरी को दी हुई उसकी जोकर वाली मूर्ति उपहार स्वरूप लौटा देता है और कहता है कि तुमको तुम्हें ही लौटा रहा हूँ। इसको जिसे भी सौंपना बहुत सोच समझ कर। इस प्रकार राजू के जीवन का, उसके प्रेम का और फिल्म का भी पहला अध्याय संपन्न होता है।
 
अब राजू सर्कस छोड़ देता है और बिना किसी लक्ष्य के इधर उधर घूमते रहता है। उसकी मुलाक़ात मीनू (पद्मिनी) से होती है, जो अनाथ लड़की है और एक प्रसिद्ध अभिनेत्री बनना चाहते रहती है। वे दोनों मिल कर छोटा सा सर्कस दिखाने लगते हैं और बाद में थियेटर में काम करने लगते हैं। वे दोनों काफी सफल हो जाते हैं और मीनू को फिल्म में काम करने का मौका भी मिल जाता है। वो अपने सपने को पूरा करने के लिए उसे छोड़ कर फिल्म में काम करने का फैसला करती है। इस तरह से राजू का तीसरी बार दिल टूट जाता है।
 
फिल्म के अंत में वो महेन्द्र से किए वादे के अनुसार अपना आखिरी करतब करता है। वो इसे दिखाने के लिए उन तीन लड़कियों को भी बुलाता है, जिससे उसने कभी प्यार किया था। वो दर्शकों को विश्वास दिलाता है कि वो फिर से आएगा और पहले से भी ज्यादा हँसाएगा।
 
== मुख्य कलाकार ==