"धर्म के लक्षण" के अवतरणों में अंतर

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(याज्ञवल्क्य)
: सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम्।।
: नृणामयं परो धर्म: सर्वेषां समुदाहृत:।
: त्रिशल्लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा येन तुष्यति।। (७-११-८ से १२ )
 
== महात्मा विदुर ==
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