"डॉन (1978 फ़िल्म)": अवतरणों में अंतर

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== कथानक ==
'डॉन' मुंबई में एक अंडरवर्ल्ड अपराधी है, जिसकी तलाश मुंबई पुलिस और इंटरपोल, दोनों को है। इंटरपोल की 'मोस्ट वांटेड' अपराधियों की सूची में शामिल डॉन हर बार पुलिस को चकमा देकर भाग निकलने में सफल हो जाता है। अपने निर्दयी स्वभाव के कारण, पुलिस के अतिरिक्त डॉन के अन्य दुश्मन भी हैं। प्रमुखतः डॉन ने एक बार अपने ही एक सहकर्मी, रमेश की हत्या कर दी थी, जिसके बाद उसकी मंगेतर 'कामिनी' तथा बहन 'रोमा' डॉन के दुश्मन बन गए। कामिनी डॉन को बहकाने की कोशिश करती है, ताकि पुलिस आकर डॉन को पकड़ ले, परन्तु डॉन कामिनी को बंधक बनाकर वहां से भाग निकलने में सफल होता है, और इस पूरे घटनाक्रम में कामिनी की मृत्यु हो जाती है। कामिनी की भी मृत्यु से आक्रोशित रोमा अपने बाल कटा लेती है, और जूडो तथा कराटे सीखकर डॉन के गिरोह में शामिल हो जाती है, ताकि मौका पाकर वह डॉन को मार दे। डॉन को पकड़ने के कई असफल प्रयत्नों के बाद पुलिस को आख़िरकार सफलता प्राप्त होती है, और डीसीपी डी'सिल्वा डॉन को लगभग पकड़ ही चुके होते हैं, कि डॉन की मृत्यु हो जाती है, और डॉन के बॉस तक पहुंचने का डी'सिल्वा का सपना अधूरा ही रह जाता है। इसके बाद डी'सिल्वा डॉन को वहीं दफना देता है।
 
मुंबई की झुग्गियों में रहने वाला विजय एक सीधा-सादा व्यक्ति है, जो मुंबई में नाच-गए कर अपने दो बच्चों के पालन की कोशिश कर रहा है। डीसीपी डी'सिल्वा की मुलाकात एक बार विजय से होती है, जिससे उन्हें पता चलता है, की विजय डॉन का हमशक्ल है, और वह विजय से डॉन बनने को कहते हैं, ताकि विजय पुलिस की मुखबिरी करे, और उसके रस्ते डी'सिल्वा इस आपराधिक नेटवर्क की तह तक पहुंच पाएं। विजय उनकी बात मान लेता है, और डॉन बनकर वापस उसकी गिरोह के पास चला जाता है, जहां वह अपनी याद्दाश्त खो जाने का बहाना बनाता है। इसी बीच जसजीत 'जेजे' जेल से छूट जाता है। जसजीत को डीसीपी डी'सिल्वा ने ही गिरफ्तार किया था; जिस कारन जेजे की पत्नी की मृत्यु हो गयी थी, और उसके दो बच्चे लापता हो गए थे। उसके दोनों बच्चों, दीपू तथा मुन्नी का लालन-पालन इसी बीच विजय कर रहा था। विजय डॉन की एक 'लाल डायरी' ले लेता है, और उसे लेकर डीसीपी डी'सिल्वा से मिलने जाता है। रोमा भी उसके साथ जाती है, और वहां उसे अकेला पाकर वह उस पर हमला कर देती है। डी'सिल्वा ऐन वक्त पर आकर रोमा को विजय की असलियत बताते हैं, और इसके बाद रोमा भी विजय के साथ मिल जाती है। विजय वह डायरी डी'सिल्वा को दे देता है, और उसे पढ़कर उन्हें पता चलता है कि डॉन के बॉस का नाम वरधान है, परन्तु उसके बारे में इससे अधिक जानकारी उस डायरी में नहीं लिखी होती।
 
धीरे धीरे विजय को डॉन केबारे में और अधिक जानकारी मिलती जाती है, और एक दिन रोमा की सहायता से वह घोषणा कर देता है, कि उसकी याद्दाश्त वापस आ चुकी है। इसी ख़ुशी में एक पार्टी होती है, जिसमें पुलिस की रेड पड़ जाती है। इस रेड में गोलीबारी में डीसीपी डी'सिल्वा बुरी तरह घायल हो जाते हैं, और पुलिस विजय को डॉन समझकर पकड़ लेती है। विजय उन लोगों को सच बताता है, जिसके बाद पुलिस वाले उसे डीसीपी डी'सिल्वा के पास हस्पताल ले जाते है; किन्तु कुछ बोल पाने से पहले ही डीसीपी डी'सिल्वा की मृत्यु हो जाती है। विजय को एक ट्रक द्वारा हाई-सिक्योरिटी जेल भेजा जा रहा होता है, और वह ट्रक से भाग निकलने में सफल हो जाता है। इसके बाद वह स्वयं को निर्दोष साबित करने के लिए रोमा की मदद से खुद कोई तरकीब सोचने लगता है। विजय इस घटनाक्रम में बुरी तरह उलझ जाता है, क्योंकि पुलिस यह मानने से मना करती है कि वह विजय हैं, और साथ ही डॉन के अंडरवर्ल्ड गिरोह को यह एहसास हो जाता है कि वह वास्तव में डॉन नहीं हैं। ऊपर से वह लाल डायरी, जो उसने डीसीपी डी'सिल्वा को दी थी, उसे जसजीत चुरा ले जाता है। विजय रोमा की सहायता से पुलिस और नारंग, अंडरवर्ल्ड गिरोह के वर्तमान सरगना, दोनों को चकमा देने में सफल रहता है, और वापस अपनी पुरानी जिंदगी में लौटने का प्रयास करता है।
 
विजय इंटरपोल के अफसर, आर के मालिक से मिलने का आग्रह करता है, और उनसे कुछ समय की मांग करता है, ताकि वह अपनी बेगुनाही का प्रमाण ला सके। तब उसे पता चलता है कि जिसे वह अब तक इंटरपोल अफसर आर के मालिक समझ रहा था, वह ही वास्तव में वरधान है, जो असली आर के मालिक को अगवा कर उनका भेष लेकर बैठा है। उसे यह भी पता चलता है कि डीसीपी डी'सिल्वा की हत्या भी वरधान ने ही की थी। विजय यह बात पुलिस के अन्य अधिकारीयों को बताने का प्रयास करता है, लेकिन वे लोग उसकी बातों पर विश्वास नहीं करते। इसके बाद विजय वरधान के सभी गुंडों से स्वयं लड़ता है, और इसी बीच रोमा भी वह लाल डायरी ढूंढकर ले आती है। इसी लड़ाई में एक गुंडा रोमा से वह डायरी छीनकर उसे जला देता है। पुलिस उन लोगों को चारों तरफ से घेर लेती है, और उस समय विजय अपनी जेब से लाल दिएरीय निकालकर उन्हें बताता है, की जो डायरी जलाई गई, वह वास्तव में नकली थी। डॉन वह डायरी पुलिस को देता है, और उसे निर्दोष घोषित कर उस पर लगे सभी प्रभार हटा दिए जाते हैं। असली आर के मालिक को छुड़ाकर पुलिस वरधान को गिरफ्तार कर लेती है, और विजय रोमा, जसजीत, दीपू तथा मुन्नी के साथ अपनी पुरानी जिंदगी में लौट जाता है।
 
[[श्रेणी:1978 में बनी हिन्दी फ़िल्म]]
[[श्रेणी:कल्याणजी–आनंदजी द्वारा संगीतबद्ध फिल्में]]