"रीति काल" के अवतरणों में अंतर

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{{स्रोतहीनरामचंद्र शुक्ल|date=जून 2015}}
सन् १७०० ई. के आस-पास [[हिंदी]] कविता में एक नया मोड़ आया। इसे विशेषत: तात्कालिक दरबारी संस्कृति और [[संस्कृत साहित्य]] से उत्तेजना मिली। संस्कृत साहित्यशास्त्र के कतिपय अंशों ने उसे शास्त्रीय अनुशासन की ओर प्रवृत्त किया। हिंदी में 'रीति' या 'काव्यरीति' शब्द का प्रयोग [[काव्यशास्त्र]] के लिए हुआ था। इसलिए काव्यशास्त्रबद्ध सामान्य सृजनप्रवृत्ति और [[रस]], [[अलंकार]] आदि के निरूपक बहुसंख्यक लक्षणग्रंथों को ध्यान में रखते हुए इस समय के काव्य को ''''रीतिकाव्य'''' कहा गया। इस काव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों की पुरानी परंपरा के स्पष्ट संकेत [[संस्कृत]], [[प्राकृत]], [[अपभ्रंश]], [[फारसी]] और हिंदी के आदिकाव्य तथा कृष्णकाव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों में मिलते हैं।
 
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