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* [[गोवर्धन]] - जहां प्रभु ने पर्वत उंगली पर उठाया था।
* [[भद्रवन]] - इस वन में कृष्ण जी ने लीला की थी। इसे भदावल नाम से भी जाना जाता है।
 
==ब्रज का प्राचीन गौरव==
यमुना नदी की पावन धारा के तट का यह भू-भाग, जिसे आजकल ब्रजमण्डल या मथुरामण्ल कहते हैं और जो पहिले 'मध्य देश' अथवा 'ब्रह्मर्षि देश' के अन्तर्गत शूरसेन जनपद के नाम से प्रसिद्ध था, भारतवर्ष का अत्यन्त प्राचीन और महत्वपूर्ण प्रदेश माना गया है। अत्यन्त प्राचीन काल से ही इसी गौरव-गाथा के सूत्र मिलते हैं। हिन्दू, जैन और बौद्धों की धार्मिक अनुश्रुतियों तथा संस्कृत, पालि, प्रकृत के प्राचीन ग्रन्थों में इस पवित्र भू-खण्ड का विशद वर्णन मिलता है।
 
=== हिन्दू उल्लेख और अनुश्रुतियाँ ===
 
संसार के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ [[ॠगवेद]] में [[यमुना]] तट की इस मनोरम भूमि और इस पर विचरण करने वाली लम्बे सीगों से सम्पन्न सुन्दर गायों के उल्लेख के साथ ही साथ, कतिपय भाष्यकारों के मतानुसार, कुछ ब्रज लीलाओं का भी संकेत मिलता है। अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण, रामायण, महाभारत और हरिवंश पुराण आदि में इस भू-भाग का विविध प्रकार से वर्णन प्रस्तुत किया गया है।
 
* आर्य ग्रन्थों के अनुसार मानवजाति के आदि पिता स्वायम्भुव मनु थे, जो मनुओं की परम्परा में प्रथम माने जाते है। उनके समय में यमुना तट का यह प्रदेश विशाल सधन वनों से अच्छादित था। कालान्तर में यह बन्य प्रदेश ॠषि-मुनियों की तपो-भूमि के रूप में परिणित हो गया, जहां अनेक सिद्ध रूप यमुना के तट के आश्रमों में तपस्या करते हुए ब्रम्ह का चिन्तन मनन करते थे। उस बन को 'मधुबन' कहा गया है। वेदों में ब्रम्हविद्या अथवा अत्मविद्या की संज्ञा 'मधुविद्या' है। कदाचित इसीलिये उस सिद्ध बन को 'मधुबन' का नाम प्राप्त हुआ था।
 
* मधुबन के महत्व की प्राचीनतम स्वीकृति उस पौराणिक उल्लेख में है, जिस में कहा गया हैं कि स्वायंभुव मनु के पुत्र ध्रुव ने नारद मुनि के उपदेश से उसी बन में तपस्या की थी। नारद जी ने ध्रूव को वतलाया था कि मधुबन की पुण्य भूमि को भगवान श्री हरि: का नित्य सानिध्य प्राप्त है। ३ अतः यहां पर तप आराधना करने से इच्छित फल की सीध्र उपलब्धि होती है। राजा अंबरीष को भी विष्णु के चक्र के द्वारा इसी भूमि पर अभय प्रदान करने की अनुश्रति प्रलित है। पौराणिक जगत् के उन प्राचीन भक्तों की स्मृति रक्षार्थ ब्रज के वर्तमान मधुबन ग्राम में ध्रुव आश्रम और ध्रुव गुफा तथा मथुरा नगर में ध्रुव टीला, अंबरीष टीला और चक्र तीर्थ जैसे पुण्य स्थल विधमान हैं, जो ब्रज की प्राचीनता और पवित्रता के साक्षी हैं।
 
* मथुरा गोवर्धन मार्ग पर शांतनुकुण्ड नामक एक प्राचीन सरोवर है, जो पौख वंश के प्रतापी महाराज शांतनु का स्मृति स्थल माना जाता है। शांतनु के पुत्र भीष्म थे, जो श्री कृष्ण के सम्बधी और कृपापात्र पाण्डवों के पितामह थे। शांतनु ने अपनी बृद्धावस्था में एक केवट कन्या सत्यवती से विवाह किया था। शांतनु कुंड के समीप का सतोहा ग्राम उक्त सत्यवती के नाम पर ही प्रसिद्ध हुआ कहा जाता है।
 
* मथुरा में यमुना नदी के जो प्राचीन धाट हैं, उनमें सोम (वर्तमान गोधाट) वैकुंठ धाट और कृष्ण गंगा नामक धाट उल्लेखनीय हैं। वाराह पुराण में कृष्ण गंगा धाट की स्थिति सोमधाट और वैकुंठ धाट के मध्य में वर्णित की गयी है और उसे महार्षि व्यास का तपस्थल कहा गया है। ४ उक्त स्थल पर किसी काम में कृष्ण गंगा नामक एक नदी यमुना में मिलती थी। व्यास जी का नाम द्वेैपाथन कृष्ण था। उनके नाम पर कृष्ण गंगा और यमुना के संगम का वह धाट कृष्ण गंगा धाट कहा जाने लगा था। ब्रज में यह अनुश्रुति प्रसिद्ध है कि व्यास जी ने इसी स्थल पर पुराणों की रचना की थी। वर्तमान काल में कृष्ण गंगा नदी तो नहीं है, किन्तु इस नाम का धाट अब भी विधमान है।
 
* प्रागैतिहासिक कालिन मधुबन के विशिष्ट भाग में यमुना नदी के तट पर एक सुन्दर नगरी का निर्माण किया गया। वह नगरी पहिले मधुपुरी अथवा मधुरा और बाद में मथुरा के नाम से विख्यात हुई। उसके एक ओर यमुना पुलिन और उसके तट की सधन कूंजों का मनोरम दृष्य था तथा तीन ओर बन-उपबन, लता और गुल्मों का प्राकृतिक वैभव था। उसके पश्चिम में कुछ दूर गोवर्धन पहाड़ी का नैसंगिक सौन्दर्य था। इस प्रकार यमुना नदी और गोवर्धन पहाड़ी से परिवेष्ठत वह रमणीक पुरी 'मथुरा' के नाम से लोक में प्रसिद्ध हुई। ५ इसके निर्माण और विकास के लिये मधु और उसके पुत्र लवण, रामानुज, शत्रुधन और उसके पुत्र सवाहु-शूरसेन तथा सत्वत से लेकर उग्रसेन और उनके पुत्र कंस तक क्रमशः दैत्यवंशी, सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी कई राजा-महाराजाओं के नाम पुराणों में प्रसिद्ध सहित वर्णित हैं।
 
=== जैन ग्रन्थ और अनुश्रुति ===
 
भारतवर्ष के अवैदिक धर्मों में जैन धर्म सर्वाधिक प्राचीन माना जाता है। इसके तीर्थकरों की वहुत पुरानी परम्परा है। प्रथम तीर्थकर ॠषभदेव सहित कई तीर्थकरों का प्राचीन ब्रज अथवा शूरसेन जनपद से धनिष्ठ सम्वध रहा है जिनसे नाचार्य कृत महापुराण में वर्णित है कि भगवान ॠषभदेव के आदेश से इंद्र ने इन इस भूतल पर जिन ५२ देशों का निर्माण किया था उनमें एक सूरसेन देश भी था, जिसकी राजधानी मथुरा थी। १ जैन मान्यतानुसार बाइसवे तीर्थाकर श्री नेमिनाथ श्री कृष्ण के भाई थे, इस लिये जैन धर्मावलंबियों को भी श्री कृष्ण के जन्मस्थान मथुरा और ब्रज का सदा ही महत्व स्वीकृत रहा है।
 
सतवें तीर्थकर श्री सुपार्श्वनाथ और तेइसवे तीर्थकर पार्श्वनाथ भ्रमण भी मथुरा में हुआ था २ तथा अन्तिम तीर्थकर श्री महावीर जी भी मथुरा पधारे थे। अन्तिम केवलि जम्बूस्वामी के तप और निर्वाण की भूमि होने से मथुरा जैनियों के लिये विशेष रूप से तीर्थ स्थान रहा है। मथुरा में चौरासी नामक स्थल जम्बूस्वामी की तपोभूमि होने के साथ ही साथ उनका निर्वाण स्थल भी कहा जाता है। इस प्रकार ब्रज प्रदेश और मथुरा कई तीर्थकरों की विहार भूमि विविध मुनियों की तपोभूमि एंव अनेक सिद्ध पुरुषों की निर्वाण भूमि होने के साथ-साथ जैन धर्म के सुप्रसिद्ध स्तूपों, मन्दिरों और कलाकृतियों के कारण अत्यन्त प्राचीन काल से ही सिद्ध क्षेत्र तथा उत्तरापथ का प्रमुख तीर्थ स्थल माना गया है।
 
=== बौद्ध ग्रन्थ और अनुश्रुतियां में ब्रज ===
 
बौद्ध धर्म के सर्वास्तिवादी सम्प्रदाय की मान्यता है कि इस भू-तल के मानव समाज ने सर्वसम्मति से अपना एक नेता निर्वाचित किया था, जो 'महा सम्मत' कहलाता था, वह राज एवं पिता के समान, बका परिपालक था। सर्वास्तिवादी 'विनयपिटक' में कहा गया है कि उस राजा ने मथुरा के पास अपना सर्वप्रथम राज्य स्थापित किया था। इस प्रकार बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार भी मथुरा इस भू-तल का आदि राज्य है। १ जिस समय भगवान बुद्ध मथुरा पधारे, तव उन्होंने अपने शिष्य आनन्द से कहा था कि यह आदि राज्य है जिसने अपने राजा चुना था। २ पालि साहित्य के प्रचीनतम ग्रन्थ 'अगुन्तर निकाय' निकाय में भगवान बुद्ध से पहिले के जिन १६ महा जनपदों का नामोल्लेख मिलता है, उनमें पहिला नाम शूरसेन जनपद का है। इस प्रकार बौद्ध धर्म के साहित्य में भी ब्रज की प्रागैतिहासिक परम्परा के उल्लेख प्राप्त होते हैं। स्वयं बुद्ध मथुरा पधारे थे। मथुरा से वे व्रज में स्थित वैरंजा नगर में वापिस होकर वहां वर्षावास किया था।
 
[[श्रेणी:ब्रज]]
 
==सन्दर्भ==