"चन्देल" के अवतरणों में अंतर

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[[चित्र:Vishvanatha Temple, Khajuraho (side).jpg|300px|thumb|[[खजुराहो]] का [[कंदरीय महादेव मंदिर]]]]
 
'''चन्देल वंश''' मध्यकालीन [[भारत]] का प्रसिद्ध राजवंश, जिसने 08वीं से 12वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से [[यमुना]] और [[नर्मदा]] के बीच, [[बुंदेलखंड]] तथा [[उत्तर प्रदेश]] के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर राज किया। [[चंदेल वंश]] के शासकों का [[बुंदेलखंड]] के इतिहास में विशेष योगदान रहा है। उन्‍होंने लगभग चार शताब्दियों तक [[बुंदेलखंड]] पर शासन किया। [[चन्देल]] शासक न केवल महान विजेता तथा सफल शासक थे, अपितु [[कला]] के प्रसार तथा संरक्षण में भी उनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा। चंदेलों का शासनकाल आमतौर पर [[बुंदेलखंड]] के शांति और समृद्धि के काल के रूप में याद किया जाता है। चंदेलकालीन स्‍थापत्‍य कला ने समूचे विश्‍व को प्रभावित किया उस दौरान [[वास्तुकला]] तथा [[मूर्तिकला]] अपने उत्‍कर्ष पर थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं [[खजुराहो]] के [[मंदिर]] ईस वश का प्रथम राजा नननुक था||
प्रभावित किया उस दौरान [[वास्तुकला]] तथा [[मूर्तिकला]] अपने उत्‍कर्ष पर थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं [[खजुराहो]] के [[मंदिर]] ईस वश का प्रथम राजा नननुक था||
 
== उत्पत्ति एवं परिचय ==
इस वंश की उत्पत्ति का उल्लेख कई लेखों में है। प्रारंभिक लेखों में इसे "चंद्रात्रेय" वंश कहा गया है पर यशोवर्मन् के पौत्र देवलब्धि के दुदही लेख में इस वंश को "चंद्रल्लावय" कहा है। कीर्तिवर्मन् के देवगढ़ शिलालेख में और चाहमान पृथ्वीराज तृतीय के लेख में "[[चन्देल]]" शब्द का प्रयोग हुआ है। इसकी उत्पत्ति भी [[चंद्रमा]] से मानी जाती है इसीलिये "चंद्रात्रेयनरेंद्राणां वंश" के आदिनिर्माता चंद्र की स्तुति पहले लेखों में की गई है। धंग के विक्रम सं. 1011 (954 ई.) के खजुराहो वाले लेखों में जो वंशावली दी गई है, उसके अनुसार विश्वशृक पुराणपुरुष, जगन्निर्माता, ऋषि मरीचि, अत्रि, मुनि चंद्रात्रेय भूमिजाम के वंश में नृप नंनुक हुआ जिसके पुत्र वा पति और पौत्र जयशक्ति तथा विजयशक्ति थे। विजय के बाद क्रमश: राहिल, हर्ष, [[यशोवर्मन्]] और [[धंग]] राजा हुए। वास्तव में [[नंनुक]] से ही इस वंश का आरंभ होता है और अभिलेख तथा किंवदंतियों से प्राप्त विवरणों के आधार पर उनका संबंध आरंभ से ही खजुराहों के [[गडरियाओ ]] से रहा। अरब इतिहास के लेखक कामिल ने भी इनको "कजुराह" में रखा है। धंग से इस वंश के संस्थापक [[नंनुक]] की तिथि निकालने के लिय यदि हम प्रत्येक पीढ़ी के लिये 20-25 वर्ष का काल रखें तो धंग से छह पीढ़ी पहले नंनुक की तिथि से लगभग 120 वर्ष पूर्व अर्थात् 954 ई. - 120 = 834 ई. (लगभग 830 ई.) के निकट रखी जा सकती है। "[[महोबा]] खंड" में चंद्रवर्मा के अभिषेक की तिथि 225 सं. रखी गई है। यदि "चंद्रवर्मा" का नंनुक का विरुद अथवा दूसरा नाम मान लिया जाय और इस तिथि को हर्ष संवत् में मानें तो नंनुक की तिथि (606 + 225) अथवा 831 ई. आती है। अत: दोनों अनुमानों से नंनुक का समय 831 ई. माना जा सकता है।
 
इस [[चन्देल]] के विषय में और कोई जानकारी प्राप्त नहीं है क्योंकि अन्य चंदेल अभिलेखों में इसका नाम भी नहीं मिलता। वाक्पति ने विंध्या के कुछ शत्रुओं को हराकर अपना राज्य विस्तृत किया। तृतीय नृप जयशक्ति ने अपने ही नाम से अपने राज्य का नामकरण [[जेजाकभुक्ति]] किया। कदाचित् यह [[प्रतिहार]] सम्राट् [[भोज]] का सामंत राजा था और यही स्थिति उसके भाई विजयशक्ति तथा पुत्र राहिल की भी थी। हर्ष और उसके पुत्र [[यशोवर्मन्]] के समय परिस्थिति बदल गई। पाल वंश ([[बघेल]]) और राष्ट्रकूटों के बीच निरंतर युद्ध से अन्य शक्तियाँ भी ऊपर उठने लगीं। इसके अतिरिक्त महेंद्रपाल के बाद [[कन्नौज]] के सिंहासन के लिये भोज द्वितीय तथा क्षितिपाल में संघर्ष हुआ। खजुराहो के एक लेख में हर्ष अथवा उसके पुत्र यशोवर्मन् द्वारा पुन: क्षितिपाल को सिंहासन पर बैठाने का उल्लेख है- ''पुनर्येन श्री क्षितिपालदेव नृपसिंह: सिंहासने स्थापित:''।
चंदेल राजा [[प्रतिहार]] सम्राटों के अधीन थे। धंग के नन्योरा के लेख (वि॰सं॰ 1055-978) में हर्ष के अधीनस्थ राजाओं का उल्लेख है। [[चाहमान]] तथा [[कलचुरि राजवंश|कलचुरि वंशों]] के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर, चंदेल राजा उत्तरी भारत की राजनीतिक परिस्थिति में अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयास करने लगे। हर्ष के पुत्र [[यशोवर्मन्]] के समय चंदेलों का गौड़, कोशल, मिथिला, मालव, चेदि, राजाओं के साथ संघर्ष का संकेत है। उसने [[कालिंजर]] भी जीता। प्रशस्तिकार ने उसकी प्रशंसा बढ़ा चढ़ाकर की हो तब भी इसमें संदेह नहीं कि चंदेल राज्य धीरे धीरे शक्तिशाली बन रहा था। नाम मात्र के लिये इस वंश के राजा [[प्रतिहार]] राजाओं का आधिपत्य माने हुए थे। धंग के खजुराहों लेख में अंतिम बार सम्राट् विनायकपालदेव का उल्लेख हुआ है। धंगदेव वैधानिक रूप से और वस्तुत: स्वतंत्र हो गया था। यशोवर्मन् के समय खजुराहों के विष्णुमंदिर में बैकुंठ की मूर्तिस्थापना का लेख है जिसे कैलास से भोटनाथ से प्राप्त की थी। मित्र रूप में वह केर राजा शाहि के पास आई और उसमें हयपति देवपाल के पुत्र हेरंबपाल ने लड़कर प्राप्त की। देवपाल से यह मूर्ति यशोवर्मन् को मिली। कुछ विद्वान् इससे चंदेलों की प्रतिहार राजा पर विजय का संकेत मानते हैं, पर यथार्थ तो यह है कि "हयपति" उपाधि का प्रतिहार सम्राट् से संबंध ही था। कदाचित् वह कोई स्थानीय राजा रहा होगा।
 
चंदेलों में '''[[धंगदेव]] [[गडरिया]] सबसे पसिद्ध तथा शक्तिशाली राजा हुआ और इसने 50 वर्ष (950 से 1000 ई.) तक राज किया। उसके लंबे राज्यकाल में खजुराहो के दो प्रसिद्ध मंदिर विश्वनाथ तथा पार्श्वनाथ बने। [[पंजाब]] के राजा [[जयपाल]] की सहायता के लिये [[अजमेर]] और कन्नौज के राजाओं के साथ उसने गजनी के सम्राट् सुबुक्तगीन के विरुद्ध सेना भेजी। उसके पुत्र '''गंड''' (1001-1017) ने भी अपने पिता की भाँति पंजाब के राजा [[आनंदपाल]] की [[महमूद गजनी]] के विरुद्ध सहायता की। महमूद के कन्नौज पर आक्रमण और राज्यपाल के आत्मसमर्पण के विरोध में गंड के पुत्र '''विद्याधर''' ने कन्नौज के राजा का वध कर डाला, पर 1023 ई. में गंड को स्वयं कालिंजर का गढ़ महमूद को दे देना पड़ा। महमूद के लौटने पर यह पुन: चंदेलों के पास आ गया। गंड के समय कदाचित् जगदंबी नामक वैष्णव मंदिर तथा चित्रगुप्त नामक सूर्यमंदिर बने। गंड के पुत्र विद्याधर (लगभग 1019-1029) को इब्नुल अथीर नामक मुसलमान लेखक ने अपने समय का सबसे शक्तिशाली राजा कहा है। उसके समय चंदेलों ने कलचुरी और परमारों पर विजय पाई और 1019 तथा 1022 में महमूद का मुकाबला किया। [[चंदेल]] [[गडरिया ]] राज्य की सीमा विस्तृत हो गई थी। कंदरीय महादेव का विशाल मंदिर भी इसी ने बनवाया (देखिए, [[खजुराहो]])।
 
विद्याधर के बाद [[चन्देल]] राज्य की कीर्ति और शक्ति घटने लगी। [[विजयपाल]] (लगभग 1029-51) इस युग का प्रमुख चंदेल नृप हुआ। कीर्तिवर्मन् (1070-95) तथा मदनवर्मन् (लगभग 1029-1162) भी प्रमुख चंदेल नृप हुए। कलचुरी सम्राट् दाहिले की विजय से 1040-70 तक के लंबे काल के लिये चंदेलों की शक्ति क्षीण हो गई थी। [[विल्हण]] ने कर्ण को [[कालिंजर]] का राजा बताया है। '''कीर्तिवर्मन्''' ने चंदेलों की खोई हुई शक्ति और कलचुरियों द्वारा राज्य के जीते हुए भाग को पुन: लौटाकर अपने वंश की लुप्त प्रतिष्ठा स्थापित की। उसने सोने के सिक्के भी चलाए जिसमें कलचुरि [[आंगदेव]] के सिक्कों का अनुकरण किया गया है। [[केदार मिश्र]] द्वारा रचित "[[प्रबोधचंद्रोदय]]" (1065 ई.) इसी चंदेल सम्राट् के दरबार में खेला गया था। इसमें [[वेदांत]]दर्शन के तत्वों का प्रदर्शन है। यह कला का भी प्रेमी था और खजुराहों के कुछ मंदिर इसके शासनकाल में बने। कीर्तिवर्मन् के बाद सल्लक्षण बर्मन् या हल्लक्षण वर्मन्, जयवर्मनदेव तथा पृथ्वीवर्मनदेव ने राज्य किया। अंतिम सम्राट्, जिसका वृत्तांत "चंदरासो" में उल्लिखित है, परमर्दिदेव अथवा [[परमाल]] (1165-1203) था। इसका चौहान सम्राट् पृथ्वीराज चौहान से संघर्ष हुआ और 1208 में कुतबुद्दीन ने कालिंजर का गढ़ इससे जीत लिया, जिसका उल्लेख मुसलमान इतिहासकारों ने किया है। चंदेल राज्य की सत्ता समाप्त हो गई पर शसक के रूप में इस वंश का अस्तित्व कायम रहा। 16वीं शताब्दी में स्थानीय शासक के रूप में चंदेल राजा बुंदेलखंड में राज करते रहे पर उनका कोई राजनीतिक प्रभुत्व न रहा।