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→‎स्थापना व संरक्षण: हेमंत कुमार गुप्त बंस का शासक भी रह था
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== स्थापना व संरक्षण ==
इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय [[गुप्त राजवंश|गुप्त शासक]] [[कुमारगुप्त प्रथम]] [[४५०]]-[[४७०]] को प्राप्त है।<ref name="सतीश">{{cite book|title=भारतीय जनता का इतिहास और संस्कृति: श्रेण्य युग |author=क॰मा॰ मुंशी, आर॰सी॰ मजुमदार |url=http://books.google.co.in/books?id=KtF8zGa5zvcC&pg=PT470 |page=470|publisher=मोतीलाल बनारसीदास पब्लिसर्स |year=1984 |isbn=9788120822887}}</ref><ref name="डिवाइन">{{cite book|title=प्राचीन भारत का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास |url=http://books.google.co.in/books?id=EGR2yLsj1DcC&pg=PA191|author=धनपति पाण्डेय |page=191|publisher=मोतीलाल बनारसीदास पब्लिसर्स |year=1998 |isbn=9788120823808}}</ref> इस विश्वविद्यालय को हेमंत कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट [[हर्षवर्द्धन]] और [[पाल वंश|पाल शासकों]] का भी संरक्षण मिला। स्थानीय शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से भी अनुदान मिला।
 
== स्वरूप ==
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