"शिमला समझौता" के अवतरणों में अंतर

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28 जून से 1 जुलाई तक दोनों पक्षों में कई दौर की वार्ता हुई परन्तु किसी समझौते पर नहीं पहुँच सके। इसके लिए पाकिस्तान की हठधर्मी ही मुख्य रूप से जिम्मेदार थी। तभी अचानक 2 जुलाई को लंच से पहले ही दोनों पक्षों में समझौता हो गया, जबकि भुट्टो को उसी दिन वापस जाना था। इस समझौते पर पाकिस्तान की ओर से बेनजीर भुट्टो और भारत की ओर से इन्दिरा गाँधी ने हस्ताक्षर किये थे। यह समझना कठिन नहीं है कि यह समझौता करने के लिए भारत के ऊपर किसी बड़ी विदेशी ताकत का दबाव था। इस समझौते से भारत को पाकिस्तान के सभी 93000 से अधिक युद्धबंदी छोड़ने पड़े और युद्ध में जीती गयी 5600 वर्ग मील जमीन भी लौटानी पड़े। इसके बदले में भारत को क्या मिला यह कोई नहीं जानता। यहाँ तक कि पाकिस्तान में भारत के जो 54 युद्धबंदी थे, उनको भी भारत वापस नहीं ले सका और वे 41 साल से आज भी अपने देश लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
अपना सब कुछ लेकर पाकिस्तान ने एक थोथा-सा आश्वासन भारत को दिया कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर सहित जितने भी विवाद हैं, उनका समाधान आपसी बातचीत से ही किया जाएगा और उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर नहीं उठाया जाएगा। लेकिन इस अकेले आश्वासन का भी पाकिस्तान ने सैकड़ों बार उल्लंघन किया है और कश्मीर विवाद को पूरी निर्लज्जता के साथ अनेक बार अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाया है। वास्तव में उसके लिए किसी समझौते का मूल्य उतना भी नहीं है, जितना उस कागज का मूल्य है, जिस पर वह समझौता लिखा गया है।
इस समझौते में भारत और पाकिस्तान के बीच यह भी तय हुआ था कि 17 दिसम्बर 1971 अर्थात् पाकिस्तानी सेनाओं के आत्मसमर्पण के बाद दोनों देशों की सेनायें जिस स्थिति में थीं, उस रेखा को ”वास्तविक नियंत्रण रेखा“ माना जाएगा और कोई भी पक्ष अपनी ओर से इस रेखा को बदलने या उसका उल्लंघन करने की कोशिश नहीं करेगा। लेकिन पाकिस्तान अपने इस वचन पर भी टिका नहीं रहा। सब जानते हैं कि 1999 में कारगिल में पाकिस्तानी सेना ने जानबूझकर घुसपैठ की और इस कारण भारत को कारगिल में युद्ध लड़ना पड़ा।
इस समझौते में भारत और पाकिस्तान के बीच यह भी तय हुआ था कि 17 दिसम्बर 1971 अर्थात् पाकिस्तानी सेनाओं के आत्मसमर्पण के बाद दोनों देशों की सेनायें जिस स्थिति में थीं, उस रेखा को ”वास्तविक नियंत्रण रेखा“ माना जाएगा और कोई भी पक्ष अपनी ओर से इस रेखा को बदलने या उसका उल्लंघन करने की कोशिश नहीं करेगा। लेकिन पाकिस्तान अपने इस वचन पर भी टिका नहीं रहा। सब जानते हैं कि 1999 में कारगिल में पाकिस्तानी सेना ने जानबूझकर घुसपैठ की और इस कारण भारत को कारगिल में युद्ध लड़ना पड़ा। पंकज मंडोठिया के अनुसार शिमला समझौते की समीक्षा कश्मीर के बहाने पाकिस्तान ने दशकों से भारत के साथ कई सैन्य कार्रवाई जारी रखी हर बार युद्ध में हारने के बाद पाकिस्तान ने सैन्य कार्यवाही, आतंकवादी गतिविधियों और कश्मीर के लोगों को इस्लाम के नाम पर भारत के विरुद्ध भड़काना शुरू किया जिस की वजह से कश्मीर समस्या और ज्यादा पेचीदा और उलझा हुआ मुद्दा बन गई साथ ही चीन को कश्मीर के मद्दे पर पाकिस्तान ने खुद के पक्ष में रखने के लिये POK के उत्तर में इस्थित एक छोटे से भाग को चीन को गिफ़्त में दे दिया जिस का विरोध भारत सयुंक्त राष्ट्र में भी कर चुका है जिस से साफ है कि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को शांति से हल करने के पक्ष में नही है साथ ही आज पाकिस्तान पूरी दुनिया में आतंकवाद को एक्सपोर्ट करने वाला देश बन गया है अमेरिका में हुए 9/11 प्लेन हाइजेक करके हमला करने वाले सभी 10 आतंकवादी अलकायदा के थे और पाकिस्तान मूल के ब्रिटिश नागरिक थे इस प्रकार विश्व के कई देशों में आतंकवादी हमलों की श्रखला बननी शुरू हो गई वरना 1980 से 1990 के दशक में आतंकवाद जब कश्मीर में अपने पैर पसार रहा था तो अमेरिका जैसे देश इस को भारत की प्रशासनिक चूक मान कर भारत के पक्ष को चुप कर देते थे, पर अब इस को वैश्विक चिंता समझा जा रहा है पर आज भी कुछ स्वार्थी देश इस का स्तेमाल अपने कूटनीतिक महत्वकांशा की पूर्ति और गुप्त सूचनाओं की प्राप्ति के लिये करना चाहते हैं जो मानवता के लिये सीधा सीधा खतरा है। सँयुक्त राष्ट्र को विश्व शांति के लिये ज्यादा शक्ति और अधिकार देने की आवश्यकता है जैसे कि UN के सभी सदस्य देशों की सर्व सममिति से UN रेसूलुशन में शनशोधन की प्रक्रिया शुरू हो और यह शनशोधन सिर्फ परस्पर देशों के बीच हुए समझौतों , सिंधीयों और तमाम हस्ताक्षर किए गए OMU के आधार पर सुधार की भावना से इन को UN के आधीनियमों का भाग बना दिया जाये जिस से विवादित और दुश्मन देशों के बीच हुए शांति समझौतों को दृढ़ता से लागू किया जाये उन पर निगरानी रखी जाये, इस से विश्वशांति को मजबूती और शक्ति प्रदान हो सकेगी ,नही तो शिमला समझौते जैसे समझौतों को मात्र अपनी कूटनीतिक महत्वकांशा के लिये स्तेमाल किया जाता रहेगा जब तक इस प्रकार के समझौतों को UN के आर्टिकल में एक विशेष नंबर के रूप में स्थान नही मिलता। तब तक इन शांति समझौतों का महत्व आंशिक और अपूर्ण रहेगा।
 
== इतिहास ==
 
== आलोचना ==
भारत में शिमला समझौते के आलोचकों ने कहा कि यह समझौता तो एक प्रकार से पाकिस्तान के सामने भारत का समर्पण था क्योंकि भारत की सेनाओं ने पाकिस्तान के जिन प्रदेशों पर अधिकार किया था अब उन्हें छोड़ना पड़ा। परंतु शिमला समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि दोनों देशों ने अपने विवादों को आपसी बातचीत से निपटाने का निर्णय किया। इसका यह अर्थ हुआ कि कश्मीर विवाद को अंतरराष्ट्रीय रूप न देकर, अन्य विवादों की तरह आपसी बातचीत से सुलझाया जाएगा। It was not good according
 
==सन्दर्भ==