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:;मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
:;रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
:;सब बिधि अगम बिचारहिं तातों 'सूर' सगुन लीला पद गावै॥
* [[कृष्णदास]] (१४९५ ई. - १५७५ ई.)
:;देख जिऊँ माई नयन रँगीलो।
:;'कृष्णदास प्रभु रसिक मुकुट मणि, सुभग चरित रिपुदमन हठीलो॥
* [[परमानन्ददास]] (१४९१ ई. - १५८३ ई.)
:;बृंदावन क्यों न भए हम मोर।
:;करत निवास गोबरधन ऊपर, निरखत नंद किशोर।
:;क्यों न भये बंसी कुल सजनी, अधर पीवत घनघोर।
:;क्यों न भए गुंजा बन बेली, रहत स्याम जू की ओर॥
:;क्यों न भए मकराकृत कुण्डल, स्याम श्रवण झकझोर।
:;'परमानंद दास' को ठाकुर, गोपिन के चितचोर॥
* [[गोविंदस्वामी]] (१५०५ ई. - १५८५ ई.)
* [[छीतस्वामी]] (१४८१ ई. - १५८५ ई.)
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