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:;रस में रसिक रसिकनी भौहँन, रसमय बचन रसाल रसीलो॥
:;सुंदर सुभग सुभगता सीमा, सुभ सुदेस सौभाग्य सुसीलो।
:;'कृष्णदास' प्रभु रसिक मुकुट मणि, सुभग चरित रिपुदमन हठीलो॥
* [[परमानन्ददास]] (१४९१ ई. - १५८३ ई.)
:;बृंदावन क्यों न भए हम मोर।
:;'छीतस्वामी' गिरिधरन श्री विट्ठल प्रीत के लिये अब संग धारी ॥
* [[नंददास]] (१५३३ ई. - १५८६ ई.)
:;नंद भवन को भूषण माई ।
:;यशुदा को लाल, वीर हलधर को, राधारमण सदा सुखदाई ॥
:;इंद्र को इंद्र, देव देवन को, ब्रह्म को ब्रह्म, महा बलदाई ।
:;काल को काल, ईश ईशन को, वरुण को वरुण, महा बलजाई ॥
:;शिव को धन, संतन को सरबस, महिमा वेद पुराणन गाई ।
:;‘नंददास’ को जीवन गिरिधर, गोकुल मंडन कुंवर कन्हाई ॥
* [[चतुर्भुजदास]]1530 ई-
 
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