"बाजीराव प्रथम" के अवतरणों में अंतर

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इस समय भारत की जनता मुगलों के साथ-साथ अंग्रेजों व पुर्तगालियों के अत्याचारों से त्रस्त हो चुकी थी। ये भारत के देवस्थान तोड़ते, जबरन धर्म परिवर्तन करते, महिलाओं व बच्चों को मारते व भयंकर शोषण करते थे।<ref name="दुनिया"/> ऐसे में श्रीमंतबाजीराव पेशवा ने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक ऐसी विजय पताका फहराई कि चारों ओर उनके नाम का डंका बजने लगा। लोग उन्हें शिवाजी का अवतार मानने लगे। श्रीमंतबाजीराव पेशवा में शिवाजी महाराज जैसी ही वीरता व पराक्रम था तो एक अपवाद छोड़कर लगभग वैसा ही उच्च चरित्र भी था।
 
[[शकरखेडला]] (Shakarkhedla) में श्रीमंत पेशवा ने मुबारिज़खाँ को परास्त किया। (१७२४)। [[मालवा]] तथा [[कर्नाटक]] पर प्रभुत्व स्थापित किया (१७२४-२६)। पालखेड़ में महाराष्ट्र के परम शत्रु निजामउलमुल्क को पराजित कर (१७२८) उससे चौथ तथा सरदेशमुखी वसूली। फिर मालवा और बुंदेलखंड पर आक्रमण कर मुगल सेनानायक गिरधरबहादुर तथा दयाबहादुर पर विजय प्राप्त की (१७२८)। तदनंतर मुहम्मद खाँ बंगश को परास्त किया (१७२९)। [[दभोई]] में त्रिंबकराव को नतमस्तक कर (१७३१) उसने आंतरिक विरोध का दमन किया। सीदी, आंग्रिया तथा पुर्तगालियों एवं अंग्रेजो को भी बुरी तरह विजित किया। [[दिल्ली]] का अभियान (१७३७) उनकी सैन्यशक्ति का चरमोत्कर्ष था। उसी वर्ष [[भोपाल]] में श्रीमंतबाजीराव पेशवा ने फिर से निजाम को पराजय दी। अंतत: १७३९ में उन्होनें नासिरजंग पर विजय प्राप्त की।बाजीराव प्रथम को एक महान घुड़सवार सेनापति के रूप में जाना जाता है और इतिहास के उन महान योद्धाओं में बाजीराव का नाम आता है जिन्होंने कभी भी अपने जीवन में युद्ध नहीं हारा और बाजीराव प्रथम ने अपने जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारा और यह उनकी महानता को दर्शाता है अब शायद [[अकबर]] के बाद कोई ऐसा पहला सेनापति हुआ जिसने कभी युद्ध नहीं हारा तो वह [[बाजीराव प्रथम]] थे और भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा घुड़सवार सेनापति हुआ।अमेरिकी इतिहासकार बर्नार्ड मांटोगोमेरी के अनुसार बाजीराव पेशवा भारत के इतिहास का सबसे महानतम सेनापति था और पालखेड़ युद्ध में जिस तरीके से उन्होंने निजाम की सेनाओं को पराजित किया उस वक्त सिर्फ बाजीराव प्रथम ही कर सकते थे उसके अलावा भारत या भारतीय उपमहाद्वीप में यह सब करने की क्षमता किसी और से नहीं थी।बाजीराव प्रथम और उनके भाई चिमाजी अप्पा ने बेसिन के लोगों को पुर्तगालियों के अत्याचार से भी बचाया जो जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहे थे और यूरोपीय सभ्यता को भारत में लाने की कोशिश कर रहे थे जिसके चलते 1739 में अंतिम दिनों में अपने भाई चिमाजी अप्पा को भेजकर उन्हें पुर्तगालियों को निस्तनाभूत कर दिया और वसई की संधि करवा दी।दी।बाजीराव प्रथम को 1720 ईसवी में छत्रपति शाहू में मराठा साम्राज्य का पेशवा नियुक्त किया जिसके बाद कई सारे बड़े मंत्री उनसे नाराज हो गए जिसके कारण उन्होंने युवा सरदारों को अपने साथ में लाना शुरू कर दिया जिनमें [[मल्हारराव होलकर]], [[राणोजीराव शिंदे]] आज भी शामिल थे इन सब ने मिलकर संपूर्ण भारत पर अपना प्रभाव जमाने को कर दिया [[बाजीराव प्रथम]] प्रथम सबसे बड़ी जीत 1728 में [[पालखेड की लड़ाई]] में हुई जिसमें उन्होंने निजाम की सेनाओं को पूर्णतया दलदली नदी के किनारे ला खड़ा किया अब निजाम के पास आत्मसमर्पण के अलावा कुछ नहीं बचा था। और 6 मार्च 1728 को उन्होंने मुंगी सेवगाव की संधि की। जिसमे निजाम हैदराबाद के साथ जिसके तहत उन्होंने ढक्कन में सरदेशमुखी और चोथ को लेने का अधिकार दे दिया। और शाहु को मराठा साम्राज्य का वास्तविक छत्रपति घोषित कर दिया और संभाजी द्वितीय को कोल्हापुर का छत्रपति। उसके बाद बाजीराव ने कई और लड़ाई लड़ी परंतु 1737 में बाजीराव ने दिल्ली पर चढ़ाई करी और वह सआदत अली खान की सेना जो कि करीब एक लाख की सेना थी उसको लोग अपनी चाल को चलते उस को चकमा देकर दिल्ली की ओर निकल गए और उन्होंने चिमाजी अप्पा को करीब 10000 की सेना को लेकर निजाम को रोकने के लिए छोड़ दी थी अभी दिल्ली में लाल किले के सामने पहुंचे जहां मोहम्मद शाह जो कि मुगल सम्राट से उनको देखकर इतना घबरा गए कहीं जाकर छुप गए। वहां लूट कर बाजीराव वापस पुणे की ओर वापस लौटे जहां पर मोहम्मद शाह रंगीला ने [[साआदत अली खान]] और [[हैदराबाद के निजाम]] को लिखा कि आप बाजीराव को पुणे से पहले ही रोक ले जिसकी बाजीराव सामना भोपाल के निकट निजाम से हुआ जिसमें बाजीराव की सेना ने दोनों की सेनाओं को हरा कर दोराहा [[भोपाल]] की संधि की मालवा का संपूर्ण छेत्र मराठो को प्राप्त हो गया इससे मराठों का प्रभाव संपूर्ण भारत में स्थापित बाजीराव ने 1730 मे [[शनिवार वाड़ा]] पुणे में उसका निर्माण करवाया और पुणे देशों की राजधानी नियुक्ति की।बाजीराव ने हिंदुस्तान शाही का वादा किया और सभी हिंदुओं को एक कर विदेशी शक्तियों के खिलाफ लड़ने का बीड़ा उठाया उन्होंने 1739 में अपने भाई की चिमाजी की सेनाओं पुर्तगालियों को बेसिन पराजित कर वसई की संधि कर ली जिसके तहत पुर्तगालियों के अभद्र पूर्ण व्यवहार से भारतीय जनता को बाजीराव प्रथम ने बचा लिया बाजीराव प्रथम बहुत ही महान और काबिल हिंदू योद्धा थे संपूर्ण भारत में बाजीराव प्रथम का खौफ फैला हुआ था यहां तक कि [[जयपुर]] के राजा [[जयसिंह द्वितीय]] भी उनके लिए काफी तारीफ करते हैं।1731 में उन्होंने महाराजा छत्रसाल की बेटी से विवाह किया और बुंदेलखंड का एक तिहाई हिस्सा मराठा साम्राज्य में मिला लिया उन्होंने मोहम्मद खान बंग्स की सेना को पराजित कर महाराजा [[छत्रसाल]] को जय उसे बचा लिया और वापस उनका बुंदेलखंड राज्य को लौटा दिया इसे प्रसन्न होकर उन्होंने अपनी पुत्री [[मस्तानी]] का विवाह बाजीराव से कर दिया।।
 
अपने यशोसूर्य के मध्यकाल में ही २८ अप्रैल १७४० को अचानक रोग के कारण उनकी असामयिक मृत्यु हुई। [[मस्तानी]] नामक मुसलमान स्त्री से उनके संबंध के प्रति विरोधप्रदर्शन के कारण श्रीमंत साहेब के अंतिम दिन क्लेशमय बीते। उनके निरंतर अभियानों के परिणामस्वरूप निस्संदेह महाराष्ट्रीय शासन को अत्यधिक भार करना पड़ा। मराठा साम्राज्य सीमातीत विस्तृत होने के कारण असंगठित रह गया, मराठा संघ में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ प्रस्फुटित हुईं, तथा मराठा सेनाएँ विजित प्रदेशों में असंतुष्टिकारक प्रमाणित हुई; तथापि श्रीमंतबाजीराव पेशवा की लौह लेखनी ने निश्चय ही महाराष्ट्रीय इतिहास का गौरवपूर्ण परिच्छेद रचा।<ref name="ReferenceA"/>
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