"भारत छोड़ो आन्दोलन और बिहार" के अवतरणों में अंतर

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दिसम्बर, १९४१ में जापानी आक्रमण से अंग्रेज भयभीत हो गये थे। मार्च, १९४२ में ब्रिटिश प्रधानमन्त्री विन्सटन चर्चिल ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि युद्ध की समाप्ति के बाद भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य प्रदान किया जायेगा। २२ मार्च १९४२ को स्टेफोर्ड किप्स ने इस व्यवस्था में लाया। फलतः उनके प्रस्ताव राष्ट्रवादियों के लिए असन्तोषजनक सिद्ध हुए। ३० जनवरी १९४२ से १५ फ़रवरी १९४२ तक पटना में रहकर मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने सार्वजनिक सभा को सम्बोधित किया।
 
१४ जुलाई १९४२ को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक का आयोजन किया गया। इसी समय सुप्रसिद्ध भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकृत हुआ और उसे अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति को मुम्बई में होने वाली बैठक में प्रस्तुत करने का निर्णय हुआ। 7 अगस्त १९४२1942 को मुम्बई में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया और गाँधी जी ने करो या मरो का नारा दिया साथ ही कहा हम देश को चितरंजन दास की बेड़ियों में बँधे हुए देखने को जिन्दा नहीं रहेंगे। ८ अगस्त को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के तुरन्त बाद कांग्रेस के अधिकतर नेता गिरफ्तार कर लिये गये। डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद में मथुरा बाबू, श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह बाबू इत्यादि भी गिरफ्तार कर लिए गये। बलदेव सहाय ने सरकारी नीति के विरोध में महाधिवक्‍ता पद से इस्तीफा दे दिया। ९ अगस्त अध्यादेश द्वारा कांग्रेस को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। इसके फलस्वरूप गवर्नर ने इण्डिपेंडेन्ट पार्टी के सदस्य मोहम्मद युनुस को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रण किया। मोहम्मद युनुस बिहार के भारतीय प्रधानमन्त्री बने।
 
(तत्कालीन समय में प्रान्त के प्रधान को प्रधानमन्त्री कहा जाता था।)
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