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रसखान अर्थात् रस के खान, परंतु उनका असली नाम सैयद इब्राहिम था और उन्होंने अपना नाम केवल इस कारण रखा ताकि वे इसका प्रयोग अपनी रचनाओं पर कर सकें।
 
रसखान तो रसखान ही था जिसके नाम में भी रस की खान थी। रसखान जैसा भगवान का भक्त होना मुश्किल है। जय श्री कृष्णा!
==काव्य रचना==
रसखान एक महान कवि थे। उनकी अधिकांश रचनायें [[भगवान कृष्ण]] को समर्पित हैं। निम्नलिखित [[सवैया]] में रसखान ने अगले जन्म के लिये ब्रज के आसपास उत्पन्न होने की कामना की है-
:'' मानुष हों तो वही रसखान, बसौं नित गोकुल गाँव के ग्वारन।
:''जो पसु हौं तौ कहा बसु मेरौ, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।।
:''पाहन हौं तौ वही गिरि कौ जुधर्यौ कर छत्र पुरंदर कारन।
:''जो खग हौं तो बसेरौं नित, कालिंदी-कूल कदंब की डारन।।
 
== बाहरी कड़ियाँ ==
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