"मैथिलीशरण गुप्त" के अवतरणों में अंतर

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{{Infobox writer
| name = मैथिलीशरण गुप्त
 
== जीवन परिचय ==
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म ३ अगस्त १८८६ में पिता सेठ रामचरण कनकने और माता काशी बाई की तीसरी संतान के रूप में [[उत्तर प्रदेश]] में [[झांसी]] के पास [[चिरगांव]] में हुआ। <ref> {{cite web|url=http://sahityasadansetuprakashan.com/wp-content/uploads/2018/06/MSG-LIFE-SCETCH1-768x1010.jpg|title=मैथिली शरण गुप्त की जीवन रेखा|work=sahityasadansetuprakashan.com|accessdate=20 अप्रैल 2019}} </ref> माता और पिता दोनों ही [[वैष्णव]] थे। विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। रामस्वरूप शास्त्री, दुर्गादत्त पंत, आदि ने उन्हें विद्यालय में पढ़ाया। घर में ही [[हिन्दी]], [[बंगला]], [[संस्कृत साहित्य]] का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी जी ने उनका मार्गदर्शन किया। १२ वर्ष की अवस्था में [[ब्रजभाषा]] में '''कनकलता''' नाम से कविता रचना आरम्भ किया। आचार्य [[महावीर प्रसाद द्विवेदी]] के सम्पर्क में भी आये। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक "[[सरस्वती पत्रिका|सरस्वती]]" में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई।
 
प्रथम काव्य संग्रह "रंग में भंग" तथा बाद में "जयद्रथ वध" प्रकाशित हुई। उन्होंने [[बांग्ला|बंगाली]] के काव्य ग्रन्थ "मेघनाथ वध", "ब्रजांगना" का अनुवाद भी किया। सन् 1912 - 1913 ई. में राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत "[[भारत भारती]]" का प्रकाशन किया। उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। [[संस्कृत]] के प्रसिद्ध ग्रन्थ "[[स्वप्नवासवदत्ता]]" का अनुवाद प्रकाशित कराया। सन् १९१६-१७ ई. में महाकाव्य '[[साकेत]]' की रचना आरम्भ की। [[उर्मिला]] के प्रति उपेक्षा भाव इस ग्रन्थ में दूर किये। स्वतः प्रेस की स्थापना कर अपनी पुस्तकें छापना शुरु किया। साकेत तथा पंचवटी आदि अन्य ग्रन्थ सन् १९३१ में पूर्ण किये। इसी समय वे राष्ट्रपिता [[महात्मा गाँधी|गांधी]] जी के निकट सम्पर्क में आये। 'यशोधरा' सन् १९३२ ई. में लिखी। [[महात्मा गांधी|गांधी जी]] ने उन्हें "राष्टकवि" की संज्ञा प्रदान की। 16 अप्रैल 1941 को वे व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिए गए। पहले उन्हें झाँसी और फिर आगरा जेल ले जाया गया। आरोप सिद्ध न होने के कारण उन्हें सात महीने बाद छोड़ दिया गया। सन् 1948 में [[आगरा विश्वविद्यालय]] से उन्हें डी.लिट. की उपाधि से सम्मानित किया गया। १९५२-१९६४ तक [[राज्यसभा]] के सदस्य मनोनीत हुये। सन् १९५३ ई. में [[भारत सरकार]] ने उन्हें [[पद्म विभूषण]] से सम्मानित किया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ॰ [[राजेन्द्र प्रसाद]] ने सन् १९६२ ई. में अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया तथा [[काशी हिन्दू विश्वविद्यालय|हिन्दू विश्वविद्यालय]] के द्वारा डी.लिट. से सम्मानित किये गये। वे वहाँ मानद प्रोफेसर के रूप में नियुक्त भी हुए। [[१९५४]] में साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में [[पद्म भूषण]] से सम्मानित किया गया। [[चिरगाँव]] में उन्होंने १९११ में [http://sahityasadansetuprakashan.com/ '''साहित्य सदन'''] नाम से स्वयं की प्रैस शुरू की और झांसी में १९५४-५५ में '''मानस-मुद्रण''' की स्थापना की।
 
==काव्यगत विशेषताएँ==
गुप्त जी स्वभाव से ही लोकसंग्रही कवि थे और अपने युग की समस्याओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील रहे। उनका काव्य एक ओर वैष्णव भावना से परिपोषित था, तो साथ ही जागरण व सुधार युग की राष्ट्रीय नैतिक चेतना से अनुप्राणित भी था। [[लाला लाजपत राय]], [[बाल गंगाधर तिलक]], [[विपिनचंद्र पाल]], [[गणेश शंकर विद्यार्थी]] और [[मदनमोहन मालवीय]] उनके आदर्श रहे। [[महात्मा गांधी]] के भारतीय राजनीतिक जीवन में आने से पूर्व ही गुप्त जी का युवा मन गरम दल और तत्कालीन क्रान्तिकारी विचारधारा से प्रभावित हो चुका था। 'अनघ' से पूर्व की रचनाओं में, विशेषकर [[जयद्रथ वध]] और [[भारत भारती]] में कवि का क्रान्तिकारी स्वर सुनाई पड़ता है। बाद में [[महात्मा गांधी]], [[राजेन्द्र प्रसाद]], और [[विनोबा भावे]] के सम्पर्क में आने के कारण वह गांधीवाद के व्यावहारिक पक्ष और सुधारवादी आन्दोलनों के समर्थक बने।
 
गुप्त जी के काव्य की विशेषताएँ इस प्रकार उल्लेखित की जा सकती हैं -<ref>[https://www.shikshabhartinetwork.com/dayinhistory.php?eventId=3778 मैथिलीशरण गुप्त</ref>
 
*(१) राष्ट्रीयता और गांधीवाद की प्रधानता
*(२) गौरवमय अतीत के इतिहास और भारतीय संस्कृति की महत्ता
*(३) पारिवारिक जीवन को भी यथोचित महत्ता
*(४) नारी मात्र को विशेष महत्व
*(५) प्रबन्ध और मुक्तक दोनों में लेखन
*(६) शब्द शक्तियों तथा [[अलंकार|अलंकारों]] के सक्षम प्रयोग के साथ मुहावरों का भी प्रयोग
*(७) पतिवियुक्ता नारी का वर्णन
 
===राष्ट्रीयता तथा गांधीवाद===
मैथिलीशरण गुप्त के जीवन में राष्ट्रीयता के भाव कूट-कूट कर भर गए थे। इसी कारण उनकी सभी रचनाएं राष्ट्रीय विचारधारा से ओत प्रोत है। वे भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के परम भक्त थे। परन्तु अन्धविश्वासों और थोथे आदर्शों में उनका विश्वास नहीं था। वे [[भारतीय संस्कृति]] की नवीनतम रूप की कामना करते थे।
 
गुप्त जी के काव्य में [[राष्ट्रवाद|राष्ट्रीयता]] और [[गांधीवाद]] की प्रधानता है। इसमें भारत के गौरवमय अतीत के इतिहास और [[भारतीय संस्कृति]] की महत्ता का ओजपूर्ण प्रतिपादन है। आपने अपने काव्य में पारिवारिक जीवन को भी यथोचित महत्ता प्रदान की है और नारी मात्र को विशेष महत्व प्रदान किया है। गुप्त जी ने [[प्रबंध काव्य]] तथा [[मुक्तक काव्य]] दोनों की रचना की। शब्द शक्तियों तथा अलंकारों के सक्षम प्रयोग के साथ मुहावरों का भी प्रयोग किया है।
 
: ''संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
: ''उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।
 
===गौरवमय अतीत के इतिहास और भारतीय संस्कृति की महत्ता===
एक समुन्नत, सुगठित और सशक्त राष्ट्रीय नैतिकता से युक्त आदर्श समाज, मर्यादित एवं स्नेहसिक्त परिवार और उदात्त चरित्र वाले नर-नारी के निर्माण की दिशा में उन्होंने प्राचीन आख्यानों को अपने काव्य का वर्ण्य विषय बनाकर उनके सभी पात्रों को एक नया अभिप्राय दिया है। जयद्रथवध, साकेत, पंचवटी, सैरन्ध्री, बक संहार, यशोधरा, द्वापर, नहुष, जयभारत, हिडिम्बा, विष्णुप्रिया एवं रत्नावली आदि रचनाएं इसके उदाहरण हैं।
 
===दार्शनिकता===
[[दर्शन]] की जिज्ञासा आध्यात्मिक चिन्तन से अभिन्न होकर भी भिन्न है । मननशील आर्यसुधियों की यह एक विशिष्ट चिन्तन प्रक्रिया है और उनके तर्कपूर्ण सिद्धान्त ही दर्शन है। इस प्रकार आध्यात्मिकता यदि सामान्य चिन्तन है तो षडदर्शन ब्रह्म जीव, जगत आदि का विशिष्ट चिन्तन । अतः दार्शनिक चिन्तन भी तीन मुख्य दिशाएँ हैं - ब्रह्म - जीव - जगत। गुप्त जी का दर्शन उनके कलाकार के व्यक्तित्व पक्ष का परिणाम न होकर सामाजिक पक्ष का अभिव्यक्तिकरण है। वे बहिर्जीवन के दृष्टा और व्याख्याता कलाकार हैं, अन्तर्मुखी कलाकार नहीं। कर्मशीलता उनके दर्शन की केन्द्रस्थ भावना है। साकेत में भी वे राम के द्वारा कहलाते हैं-
 
: ''सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया
: ''इस भुतल को ही स्वर्ग बनाने आया ।२२।
 
राम अपने कर्म के द्वारा इस पृथ्वी को ही स्वर्ग जैसी सुन्दर बनाना चाहते हैं। राम के वनगमन के प्रसंग पर सबके व्याकुल होने पर भी राम शान्त रहते हैं, इससे यह ज्ञान होता है कि मनुष्य जीवन में अनन्त उपेक्षित प्रसंग निर्माण होते हैं अतः उसके लिए खेद करना मूर्खता है। राम के जीवन में आनेवाली सम तथा विषम परिस्थितियों के अनुकूल राम की मनःस्थिति का सहज स्वाभाविक दिग्दर्शन करते हुए भी एक धीरोदात्त एवं आदर्श पुरुष के रूप में राम का चरित्रांकन गुप्त जी ने किया है। लक्ष्मण भी जीवन की प्रत्येक प्रतिक्रिया में लोकोपकार पर बल देते हैं। उनकी साधना 'शिवम्' की साधना है। अतः वे अत्यन्त उदारता से कहते हैं-
 
: ''मैं मनुष्यता को सुरत्व की
: ''जननी भी कह सकता हूँ
: ''किन्तु पतित को पशु कहना भी
: ''कभी नहीं सह सकता हूँ ।२३।
 
===रहस्यात्मकता एवं आध्यात्मिकता===
गुप्त जी के परिवार में [[वैष्णव]] [[भक्ति]] भाव प्रबल था। प्रतिदिन पूजा-पाठ, भजन, गीता पढ़ना आदि सब होता था। यही कारण है कि गुप्त जी के जीवन में भी यह आध्यात्मिक संस्कार बीज के रूप में पड़े हुए थे जो धीरे-धीरे अंकुरित होकर रामभक्ति के रूप में वटवृक्ष हो गया।
 
'साकेत' की भूमिका में निर्गुण परब्रह्म सगुण साकार के रूप में अवतरित होता है । आत्मश्रय प्राप्त कवि के लिए जीवन में ही मुक्ति मिल जाने से मृत्यु न तो विभीषिका रह जाती है और न उसे भय या शोक ही दे सकती है।
गुप्त जी ने ‘साकेत' में राम के प्रति अपनी भक्ति भावना प्रकट की है। ‘साकेत' में मुख्य रूप से उनका प्रयोजन [[उर्मिला]] की व्यथा को चित्रित करना था। पर साथ में ही राम की भक्ति भावना के गुण गाने में पीछे नहीं हटे। साकेत में हम जिस रामचरित के दर्शन करते हैं उसमें आधुनिकता की छाप अवश्य है, किन्तु उसकी आत्मा में राम के आधि दैविक रूप की ही झाँकी है और ‘साकेत' की मूल प्रेरणा है। जिस युग में राम के व्यक्तित्व को ऐतिहासिक महापुरुष या मर्यादा पुरुषोत्तम तक सीमित मानने का आग्रह चल रहा था गुप्त जी की वैष्णव भक्ति ने आकुल होकर पुकार की थी।
 
: ''राम, तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या?
: ''विश्व में रमे हुए नहीं सभी कही हो क्या?
: ''तब मैं निरीश्वर हूँ, ईश्वर क्षमा करे,
: ''तुम न रमो तो मन तुम में रमा करे ।
 
'साकेत' पूजा का एक फूल है, जो आस्तिक कवि ने अपने इष्टदेव के चरणों पर चढ़ाया है। राम के चित्रांकन में गुप्त जी ने जीवन के रहस्य को उद्घाटित किया है। राम के जन्म हेतु उन्होंने कहा है-
: ''किसलिए यह खेल प्रभु ने है किया ।
: ''मनुज बनकर मानवी का पय पिया ॥
: ''भक्त वत्सलता इसी का नाम है।
: ''और वह लोकेश लीला धाम है ।१६।
 
===नारी मात्र की महत्ता का प्रतिपादन===
नारियों की दुरवस्था तथा दुःखियों दीनों और असहायों की पीड़ा ने उसके हृदय में करुणा के भाव भर दिये थे। यही कारण है कि उनके अनेक काव्य ग्रंथों में नारियों की पुनर्प्रतिष्ठा एवं पीड़ित के प्रति सहानुभूति झलकती है। नारियों की दशा को व्यक्त करती उनकी ये पंक्तियां पाठकों के हृदय में करुणा उत्पन्न करती है-
 
: ''अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
: ''आँचल में है दूध और आँखों में पानी॥
 
===पतिवियुक्ता नारी का वर्णन===
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता के विमर्श ने गुप्त जी को साकेत महाकाव्य लिखने के लिए प्रेरित किया। भारत वर्ष में गूंजे हमारी भारती की प्रार्थना करने वाले कवि कालान्तर में, विरहिणी नारियों के दुःख से द्रवित हो जाते हैं। परिवार में रहती हुई पतिवियुक्ता नारी की पीड़ा को जिस शिद्दत के साथ गुप्तजी अनुभव करते हैं और उसे जो बानगी देते हैं, वह आधुनिक साहित्य में दुर्लभ है। उनकी वियोगिनी नारी पात्रों में [[उर्मिला]] (साकेत महाकाव्य), [[यशोधरा]] (काव्य) और [[विष्णुप्रिया]] खण्डकाव्य प्रमुख है। उनका करूण विप्रलम्भ तीनों पात्रों में सर्वाधिक मर्मस्पर्शी बन पड़ा है। उनके जीवन संघर्ष, उदात्त विचार और आचरण की पवित्रता आदि मानवीय जिजीविषा और सोदेश्यता को प्रमाणित करते हैं। गुप्तजी की तीनों विरहिणी नायिकाएं विरह ताप में तपती हुई भी अपने तन-मन को भस्म नहीं होने देती वरण कुन्दन की तरह उज्ज्वल वर्णी हो जाती हैं।
 
साकेत की उर्मिला रामायण और रामचरितमानस की सर्वाधिक उपेक्षित पात्र है। इस विरहिणी नारी के जीवन वृत्त और पीड़ा की अनुभूतियों का विशद वर्णन आख्यानकारों ने नहीं किया है। उर्मिला लक्ष्मण की पत्नी है और अपनी चारों बहनों में वही एक मात्र ऐसी नारी है, जिसके हिस्से में चौदह वर्षों के लिए पतिवियुक्ता होनेे का दु:ख मिला है। उनकी अन्य तीनों बहनों में सीता, राम के साथ, मांडवी भरत के सान्निध्य में तथा श्रुतिकीर्ति शत्रुघ्न के संग जीवन यापन करती हैं। उर्मिला का जीवन वृत्त और उसकी विरह-वेदना सर्वप्रथम मैथिलीशरण गुप्त जी की लेखनी से साकार हुई हैं।
 
गुप्तजी ने अपने काव्य का प्रधान पात्र [[राम]] और [[सीता]] को न बनाकर [[लक्ष्मण]], [[उर्मिला]] और [[भरत]] को बनाया है। गुप्तजी ने साकेत में उर्मिला के चरित्र को जो विस्तार दिया है, वह अप्रतिम है। कवि ने उसे 'मूर्तिमति उषा', 'सुवर्ण की सजीव प्रतिमा', 'कनक लतिका', 'कल्पशिल्पी की कला' आदि कहकर उसके शारीरिक सौन्दर्य की अनुपम झांकी प्रस्तुत की है। उर्मिला प्रेम एवं विनोद से परिपूर्ण हास-परिहासमयी रमणी है।
 
मैथिलीशरण गुप्त को आचार्य [[महावीरप्रसाद द्विवेदी]] का मार्गदर्शन प्राप्त था । आचार्य द्विवेदी उन्हें कविता लिखने के लिए प्रेरित करते थे, उनकी रचनाओं में संशोधन करके अपनी पत्रिका '[[सरस्वती (पत्रिका)|सरस्वती]]' में प्रकाशित करते थे। मैथिलीशरण गुप्त की पहली [[खड़ी बोली]] की कविता 'हेमन्त' शीर्षक से सरस्वती (१९०७ ई०) में छपी थी।
 
===प्रकृति वर्णन===
उनकी द्वारा लिखित खंडकाव्य [[पंचवटी]] निम्न पंक्तियाँ आज भी कविता प्रेमियों के मानस पटल पर सजीव हैं-
गुप्त जी द्वारा रचित खण्डकाव्य [[पंचवटी]] में सहज वन्य–जीवन के प्रति गहरा अनुराग और प्रकृति के मनोहारी चित्र हैं। उनकी निम्न पंक्तियाँ आज भी कविताप्रेमियों के मानस पटल पर सजीव हैं-
: ''चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
: ''स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
:'' कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
:'' पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक! <ref> {{cite web|url=http://www.kavitakosh.org/kk/%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%81_%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A5%87%E0%A4%82_/_%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A4%A3_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4|title=चारुचन्द्र की चंचल किरणें|work=kavitakosh.org|accessdate=20 अप्रैल 2019}} </ref>
 
==भाषा शैली==
मैथिलीशरण गुप्त की काव्य '''भाषा''' [[खड़ी बोली]] है। इस पर उनका पूर्ण अधिकार है। भावों को अभिव्यक्त करने के लिए गुप्त जी के पास अत्यन्त व्यापक शब्दावली है। उनकी प्रारम्भिक रचनाओं की भाषा [[तत्सम]] है। इसमें साहित्यिक सौन्दर्य कला नहीं है। 'भारत-भरती' की भाषा में खड़ी बोली की खड़खड़ाहट है, किन्तु गुप्त जी की भाषा क्रमशः विकास करती हुई सरस होती गयी। [[संस्कृत]] के शब्दभण्डार से ही उन्होंने अपनी भाषा का भण्डार भरा है, लेकिन '[[प्रियप्रवास]]' की भाषा में संस्कृत बहुला नहीं होने पायी। इसमें [[प्राकृत]] रूप सर्वथा उभरा हुआ है। भाव व्यञ्जना को स्पष्ट और प्रभावपूर्ण बनाने के लिए संस्कृत का सहारा लिया गया है। संस्कृत के साथ गुप्त जी की भाषा पर प्रांतीयता का भी प्रभाव है। उनका काव्य भाव तथा कला पक्ष दोनों की दृष्टि से सफल है।
 
'''शैलियों''' के निर्वाचन में मैथिलीशरण गुप्त ने विविधता दिखाई, किन्तु प्रधानता प्रबन्धात्मक इतिवृत्तमय शैली की है। उनके अधिकांश काव्य इसी शैली में हैं- 'रंग में भंग', 'जयद्रथ वध', 'नहुष', 'सिद्धराज', 'त्रिपथक', 'साकेत' आदि प्रबंध शैली में हैं। यह शैली दो प्रकार की है- 'खंड काव्यात्मक' तथा 'महाकाव्यात्मक'। साकेत महाकाव्य है तथा शेष सभी काव्य खंड काव्य के अंतर्गत आते हैं।
 
गुप्त जी की एक शैली विवरण शैली भी है। 'भारत-भारती' और 'हिन्दू' इस शैली में आते हैं। तीसरी शैली 'गीत शैली' है। इसमें गुप्त जी ने नाटकीय प्रणाली का अनुगमन किया है। 'अनघ' इसका उदाहरण है। आत्मोद्गार प्रणाली गुप्त जी की एक और शैली है, जिसमें 'द्वापर' की रचना हुई है। नाटक, गीत, प्रबन्ध, पद्य और गद्य सभी के मिश्रण एक 'मिश्रित शैली' है, जिसमें 'यशोधरा' की रचना हुई है।
 
इन सभी शैलियों में गुप्त जी को समान रूप से सफलता नहीं मिली। उनकी शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें इनका व्यक्तित्व झलकता है। पूर्ण प्रवाह है। भावों की अभिव्यक्ति में सहायक होकर उपस्थित हुई हैं।
 
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
 
== टिप्पणी ==
<div style=font-size:100%;>
&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''क.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|त्रिपथगा|क|none}}महाभारत कथानक के आधार पर लिखे तीन खंडकाव्य ''वन-वैभव'', ''वकसंहार'' और ''सैरन्ध्री'' '''''त्रिपथगा''''' नामक ग्रन्थ में संग्रहीत हैं।
<div style=font-size:100%;> &nbsp;&nbsp;&nbsp;'''ख.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|दिवोदास|ख|none}} '''''दिवोदास''''' ''पृथ्वीपुत्र'' का एक अंश है।
<div style=font-size:100%;> &nbsp;&nbsp;&nbsp;'''ग.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|लीला|ग|none}} ''साकेत'' महाकाव्य रामायण की कथानक की पूर्ति हेतु '''''लीला''''' की रचना हुई।
<div style=font-size:100%;> &nbsp;&nbsp;&nbsp;'''घ.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|रुबाइयात उमर खय्याम|घ|none}} मैथिलीशरण गुप्त ने [https://en.m.wikipedia.org/wiki/Edward_FitzGerald_(poet) एडवर्ड फिट्जगेराल्ड] द्वारा किए गए '''रुबाइयात उमर खय्याम''' के आंग्लिक अनुवाद का हिन्दी पद्यानुवाद किया था।
 
== इन्हें भी देखें ==
[[श्रेणी:हिन्दी कवि]]
[[श्रेणी:उत्तर प्रदेश के कवि]]
 
== टिप्पणी ==
<div style=font-size:100%;>
&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''क.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|त्रिपथगा|क|none}}महाभारत कथानक के आधार पर लिखे तीन खंडकाव्य ''वन-वैभव'', ''वकसंहार'' और ''सैरन्ध्री'' '''''त्रिपथगा''''' नामक ग्रन्थ में संग्रहीत हैं।
<div style=font-size:100%;> &nbsp;&nbsp;&nbsp;'''ख.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|दिवोदास|ख|none}} '''''दिवोदास''''' ''पृथ्वीपुत्र'' का एक अंश है।
<div style=font-size:100%;> &nbsp;&nbsp;&nbsp;'''ग.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|लीला|ग|none}} ''साकेत'' महाकाव्य रामायण की कथानक की पूर्ति हेतु '''''लीला''''' की रचना हुई।
<div style=font-size:100%;> &nbsp;&nbsp;&nbsp;'''घ.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|रुबाइयात उमर खय्याम|घ|none}} मैथिलीशरण गुप्त ने [https://en.m.wikipedia.org/wiki/Edward_FitzGerald_(poet) एडवर्ड फिट्जगेराल्ड] द्वारा किए गए '''रुबाइयात उमर खय्याम''' के आंग्लिक अनुवाद का हिन्दी पद्यानुवाद किया था।
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