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[[चित्र:Chandragupt maurya Birla mandir 6 dec 2009 (31).JPG|अंगूठाकार|मेगस्थनीज यूनान का एक राजदूत था जो जो रामफल हर कर रहे करता चन्द्रगुप्त के दरबार में आया था।]]
'''मेगस्थनीज''' (Megasthenes / Μεγασθένης, 350 ईसापूर्व - 290 ईसा पूर्व) [[यूनान]] का एक राजदूत था जो [[चन्द्रगुप्त]] के दरबार में आया था। [[यूनाना|यूनानी]] सामंत सिल्यूकस [[भारत]] में फिर राज्यविस्तार की इच्छा से 305 ई. पू. भारत पर आक्रमण किया था किंतु उसे संधि करने पर विवश होना पड़ा था। संधि के अनुसार मेगस्थनीज नाम का राजदूत चंद्रगुप्त के दरबार में आया था। वह कई वर्षों तक चंद्रगुप्त के दरबार में रहा। उसने जो कुछ भारत में देखा, उसका वर्णन उसने "[[इंडिका]]" नामक पुस्तक<ref name="Internet Archive 2016">{{cite web | title=Full text of "Indika. The Country and the People of India and Ceylon" | website=Internet Archive | date=23 अक्टूबर 2016 | url=https://archive.org/stream/DKC0054/DKC_0054_djvu.txt | language = en | accessdate=22 जनवरी 2018}}</ref> में किया है। मेगस्थनीज ने [[पाटलिपुत्र]] का बहुत ही सुंदर और विस्तृत वर्णन किया है। वह लिखता है कि भारत का सबसे बड़ा नगर पाटलिपुत्र है। यह नगर [[गंगा]] और [[सोन]] के संगम पर बसा है। इसकी लंबाई साढ़े नौ मील और चौड़ाई पौने दो मील है। नगर के चारों ओर एक दीवार है जिसमें अनेक फाटक और दुर्ग बने हैं। नगर के अधिकांश मकान लकड़ी के बने हैं।
 
मेगस्थनीज ने चंद्रगुप्त के राजप्रासाद का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है। सम्राट् का भवन पाटलिपुत्र के मध्य में स्थित था। भवन चारों ओर संुदर एवं रमणीक उपवनों तथा उद्यानों से घिरा था।
 
प्रासाद के इन उद्यानों में लगाने के लिए दूर-दूर से वृक्ष मँगाए जाते थे। भवन में मोर पाले जाते थे। भवन के सरोवर में बड़ी-बड़ी मछलियाँ पाली जाती थीं। सम्राट् प्राय: अपने भवन में ही रहता था और युद्ध, न्याय तथा आखेट के समय ही बाहर निकलता था। दरबार में अच्छी सजावट होती थी और सोने-चाँदी के बर्तनों से आँखों में चकाचौंध पैदा हो जाती थी। राजा राजप्रसाद से सोने की पालकी या हाथी पर बाहर निकलता था। सम्राट् की वर्षगाँठ बड़े समारोह के साथ मनाई जाती थी। राज्य में शांति और अच्छी व्यवस्था रहती थीं। अपराध कम होते थे। प्राय: लोगों के घरों में ताले नहीं बंद होते थे।
 
==सन्दर्भ==
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