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अठारह मुख्य पुराणों के बाद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुराण [[देवीभागवत]] में दी गयी उपपुराणों की सूची<ref>देवीभागवतपुराण-१-३-१३ से १६; देवीभागवतमहापुराण (सटीक), प्रथम खण्ड, गीताप्रेस गोरखपुर, प्रथम संस्करण- संवत् २०६७, पृष्ठ-७६.</ref> में यदि क्रम-भिन्नता को छोड़ दिया जाय तो अधिकांश नाम तो पूर्वोक्त सूची के समान ही हैं, पर कुछ नामों में भिन्नता भी है। देवी भागवत में चौथे स्थान पर शिवधर्म के बदले केवल 'शिव' नाम दिया गया है तथा ब्रह्माण्ड, मारीच एवं भार्गव के नाम छोड़ दिये गये हैं और उनके बदले आदित्य, भागवत एवं वासिष्ठ नाम दिये गये हैं। [[श्रीमद्भागवत पुराण]] एवं देवी भागवत में से कौन वस्तुतः महापुराण है, यह विवाद तो प्रसिद्ध ही है, जिस पर यहाँ कुछ भी लिखना उचित नहीं है। दूसरी बात यह कि तीन-तीन मुख्य पुराणों से उद्धृत पूर्वोक्त सूची में से किसी में भागवत या देवी भागवत -- किसी का नाम नहीं है। 'आदित्य पुराण' के नाम को लेकर भारी भ्रम प्रचलित है। कहीं तो उसे स्वतंत्र पुराण मान लिया गया है और कहीं 'सौर पुराण' का पर्यायवाची मान लिया गया है। परन्तु, इस सन्दर्भ में स्कन्द पुराण के प्रभास खण्ड तथा मत्स्य पुराण में स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है कि आदित्य महिमा से सम्बद्ध होने के कारण 'साम्ब पुराण' को ही 'आदित्य पुराण' कहा जाता है।<ref>स्कन्द पुराण, प्रभास खण्ड-२-८२,८३; स्कन्दमहापुराणम् (मूलमात्र), चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, द्वितीय संस्करण- सन् २०११, पृष्ठ-६.</ref><ref>मत्स्यपुराण-५३-६१,६२; मत्स्यमहापुराण (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, प्रथम संस्करण- संवत् २०६१, पृष्ठ-२०८.</ref> अतः आदित्य पुराण कोई स्वतंत्र पुराण न होकर साम्ब पुराण का ही पर्यायवाची नाम है। अतः इस दृष्टि से विचार करने पर भी पूर्वोक्त सूची ही सर्वाधिक प्रामाणिक ज्ञात होती है।
 
उपपुराणों के अध्येता डॉ॰ लीलाधर 'वियोगी' उपपुराणों की संख्या बढ़ाने में इस कदर लीन हो गये हैं कि अनेक जगह 'कुमार द्वारा कथित' 'स्कान्द' ही वस्तुतः 'नन्दी पुराण' है तथा 'साम्ब पुराण' का ही दूसरा नाम 'आदित्य पुराण' है, ऐसा उल्लेख रहने के बावजूद वे ऐसा कोई उद्धरण न देकर भिन्न-भिन्न पुराणों की संख्या बढ़ाते गये हैं। उपपुराणों में परिगणित 'ब्रह्माण्ड पुराण' मुख्य पुराणों में परिगणित '[[ब्रह्माण्ड पुराण]]' से भिन्न है, इसलिए दूसरे ब्रह्माण्ड के साथ 'अपर' नाम लगा रहने से डॉ॰ वियोगी उसे एक और भिन्न उपपुराण मान लेते हैं।<ref>उपपुराण -दिग्दर्शन, डॉ॰ लीलाधर 'वियोगी', आई॰बी॰ए॰ पब्लिकेशन्स, अम्बाला छावनी, प्रथम संस्करण-2007, पृष्ठ-18.</ref> श्री[[विष्णु पुराण]] भी पराशर द्वारा ही कथित है इसलिए पराशर द्वारा उक्त उपपुराण को भिन्न दिखलाने के लिए कहीं-कहीं उसके साथ 'अपर' नाम लगा दिया गया तो डॉ॰ वियोगी उसे भी पूर्व के 'पाराशर उपपुराण' से एक और भिन्न उपपुराण मान लेते हैं।<ref>उपपुराण -दिग्दर्शन, डॉ॰ लीलाधर 'वियोगी', आई॰बी॰ए॰ पब्लिकेशन्स, अम्बाला छावनी, प्रथम संस्करण-2007, पृष्ठ-14.</ref> मूल ग्रन्थों में अनेकत्र स्पष्ट उल्लेखों के बावजूद ऐसी अनवधानता के कारण पुराणों की संख्या भ्रामक रूप से बढ़ती चली गयी है।
 
=== अन्य प्रसिद्ध धर्मग्रन्थों में सूची एवं विचार ===