"आषाढ़ का एक दिन" के अवतरणों में अंतर

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नाटक के एक समीक्षक (क्रिटिक) ने कहा है के नाटक के हर खंड का अंत में "कालिदास मल्लिका को अकेला छोड़ जाता है: पहले जब वह अकेला उज्जयिनी चला जाता है; दूसरा जब वह गाँव आकर भी मल्लिका से जानबूझ कर नहीं मिलता; और तीसरा जब वह मल्लिका के घर से अचानक मुड़़ के निकल जाता है।"<ref name="dharwadker2005jkf">{{Citation | title=Theatres of independence: drama, theory, and urban performance in India since 1947 | author=Aparna Bhargava Dharwadker | publisher=University of Iowa Press, 2005 | isbn=9780877459613 | url=http://books.google.co.in/books?id=mLQaz-12Eo8C | quote=''... each of the three acts in the play ends with an act of abandonment on the part of Kalidasa: when he leaves for Ujjayini alone; when he deliberately avoids meeting with Mallika during his subsequent visit to the village; when he leaves her home abruptly at the end ...''}}</ref> यह नाटक दर्शाता है कि कालिदास के महानता पाने के प्रयास की मल्लिका और कालिदास को कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है। जब कालिदास मल्लिका को छोड़कर उज्जयिनी में बस जाता है तो उसकी ख्याति और उसका रुतबा तो बढ़ता है लेकिन उसकी सृजनशक्ति चली जाती है। उसकी पत्नी, प्रियंगुमंजरी, इस प्रयास में जुटी रहती है के उज्जयिनी में भी कालिदास के इर्द-गिर्द उसके गाँव जैसा वातावरण बना रहे "लेकिन वह स्वयं मल्लिका कभी नहीं बन पाती।"<ref name="padhy2000jkf"/> नाटक के अंत में जब कालिदास की मल्लिका से अंतिम बार बात होती है तो वह क़ुबूल करता है के "तुम्हारे सामने जो आदमी खड़ा है यह वह कालिदास नहीं जिसे तुम जानती थी।"<ref name="padhy2000jkf"/>
 
== नाटककार की टिपण्णीटिप्पणी ==
अपने दूसरे नाटक ("लहरों के राजहंस") की भूमिका में मोहन राकेश नें लिखा कि "मेघदूत पढ़ते हुए मुझे लगा करता था कि वह कहानी निर्वासित यक्ष की उतनी नहीं है, जितनी स्वयं अपनी आत्मा से निर्वासित उस कवि की जिसने अपनी ही एक अपराध-अनुभूति को इस परिकल्पना में ढाल दिया है।" मोहन राकेश ने कालिदास की इसी निहित अपराध-अनुभूति को "आषाढ़ का एक दिन" का आधार बनाया।<ref name="rakesh2009jkf">{{Citation | title=Lehron ke rajhans (King-swans of the waves) | author=Mohan Rakesh | publisher=Rajkamal Prakashan Pvt Ltd, 2009 | isbn=9788126708512 | url=http://books.google.co.in/books?id=0Fysjw9mCmQC | quote=''... मेघदूत पढ़ते हुए मुझे लगा करता था कि वह कहानी निर्वासित यक्ष की उतनी नहीं है, जितनी स्वयं अपनी आत्मा से निर्वासित उस कवि की जिसने अपनी ही एक अपराध-अनुभूति को इस परिकल्पना में ढाल दिया है (when I read Meghdoot, I would feel that the story was less about a dispossesed [[yaksha|yaksh]] than about a poet so alienated from his own soul that he has poured his guilt-realization into this opus) ...''}}</ref>