"समुच्चय अलंकार" के अवतरणों में अंतर

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[[अलंकार चन्द्रोदय]] के अनुसार हिन्दी कविता में प्रयुक्त एक अलंकार
 
{{रस छन्द अलंकार}}
 
[[श्रेणी:हिन्दी साहित्य]]
 
==भेद==
समुच्चय अलंकार के दो भेद माने गए हैं। एक तो वह जहाँ आश्चर्य, हर्ष, विषाद आदि बहुत से भावों के एक साथ उदित होने का वर्णन हो । जैसे,
: ''हे हरि तुम बिनु राधिका सेज परी अकुलाति ।
: ''तरफराति, तमकति, तचति, सुसकति, सुखी जाति ॥
 
दूसरा वह जहाँ किसी एक ही कार्य के लिये बहुत से कारणों का वर्णन हो । जैसे,
: ''गंगा गीता गायत्री गनपति गरुड़ गोपाल ।
: '' प्रातःकाल जे नर भजैं ते न परैं भव- जाल ॥
 
{{रस छन्द अलंकार}}
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