"पतञ्जलि योगसूत्र": अवतरणों में अंतर

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तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान, यह क्रिया योग है ॥१॥
 
क्रिया योग का अभ्यास समाधि प्राप्ति की भावना से, वित्तचित्त में विद्यमान क्लेशों को क्षीण करने के लिए है ॥२॥
 
अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश यह पाँच क्लेश है ॥३॥
 
क्रिया योग द्वारा तनु किए गए पंच क्लेश, शक्ति के प्रति प्रसव क्रम द्वारा त्यागे जाने योग्य हैं, जो सूक्ष्म रूप में हैं ॥१०॥<br>
(जब चेतना, प्रत्यक् चेतना होकर ऊपर की ओर चढ़ती है, तो कारवकार्यों को कारण में विलीन करती है, इसे शक्ति का प्रति प्रसव क्रम कहते हैं।)
 
ध्यान द्वारा त्याज्य उन की वृत्तियाँ हैं ॥११॥
 
क्लेश ही मूल हैं उस कर्माशय के जो दिखने वाले अर्थ वर्तमान, तथा न दिखने वाले अर्थ भविष्य मे्में होने वाले जन्मों का कारण हैं ॥१२॥
 
जब तक जीव को क्लेशों ने पकड़ रखा है, तब तक उसके कारण उदय हुए कर्माशय का फल, जाति आयु तथा भोग होता है ॥१३॥
(दृश्य के संयोग का, उलझने का) कारण अविद्या है ॥२४॥
 
उस अविद्या के अभाव से, संयोग का भी अभाव हो जाता है, यही हानज्ञान है जिसे कैवल्य मुक्ति कहा जाता है ॥२५॥
 
विवेक अर्थ दृश्य तथा दृष्टाद्रष्टा की भिन्नता का निश्चित ज्ञान, हानज्ञान का उपाय है ॥२६॥
 
उस विवेक ख्याति की सात भुमिकिएंभुमिकाएं हैं ॥२७॥
 
अष्टांग योग के अनुष्ठान से अशुद्धि का क्षय तथा विवेक ख्याति पर्यन्त प्रकाश होता है ॥२८॥
 
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि, यह योके आठ अंग हैं ॥२९॥
 
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि, यह योग के आठ अंग हैं ॥२९॥
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