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=== राजनैतिक समेकन ===
* '''1953''' : [[शेख अब्दुल्ला]] को कश्मीर के प्रधानमन्त्री पद से हटा कर ग्यारह वर्ष के लिए जेल में डाल दिया गया। ऐसा माना जाता है कि केंद्र सरकार से अनबन की वजह से नेहरु ने इन्हें जेल में डलवाया था।
 
* ''' 1964''' : साल 1964 में शेख अब्दुल्लाह जेल से बाहर आये और कश्मीर मुद्दे पर नेहरु से बात करने की कोशिश की, किन्तु इसी वर्ष नेहरु की मृत्यु हो गयी और बात हो नहीं सकी।
 
* राज्य विधान सभा के लिए [[मार्च]], [[1967]] में तीसरे आम चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस सरकार बनी
 
* [[फरवरी]], [[1972]] में चौथे आम चुनाव हुए जिनमें पहली बार जमात-ए-इस्लामी ने भाग लिया व 5 सीटें जीती। इन चुनावों में भी कांग्रेस सरकार बनी।
 
* भारत और पाकिस्तान के बीच [[3 जुलाई]], [[1972]] को ऐतिहासिक '[[शिमला समझौता]]' हुआ, जिसमें कश्मीर पर सभी पिछली उद्धोषणाएँ समाप्त की गईं, जम्मू और कश्मीर से संबंधित सारे मुद्दे द्विपक्षीय रूप से निपटाए गए, व - युद्ध विराम रेखा को नियंत्रण रेखा में बदला गया।
 
* '''1974''' : इंदिरा-शेख समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री बनाया गया। इस वर्ष ये भी निर्णय किया गया कि अब कश्मीर में [[जनमत संग्रह]] की जरुरत नहीं है।
 
* [[फरवरी]], [[1975]] को कश्मीर समझौता समाप्त माना गया, व भारत के प्रधानमंत्री के अनुसार 'समय पीछे नहीं जा सकता'; तथा कश्मीरी नेतृत्व के अनुसार- 'जम्मू और कश्मीर राज्य का भारत में अधिमिलन कोई मामला नहीं' कहा गया।
 
* [[जुलाई]], [[1975]] में शेख अब्दुल्ला मुख्य मंत्री बने, जनमत फ्रंट स्थापित और नेशनल कांफ्रेंस के साथ विलय किया गया।
 
* [[जुलाई]], [[1977]] को पाँचवे आम चुनाव हुए जिनमें नेशनल कांफ्रेंस पुन: सत्ता में लौटी - 68% मतदाता उपस्थित हुए।
 
* शेख अब्दुल्ला का निधन [[8 सितम्बर]], [[1982]] होने पर, उनके पुत्र डॉ॰ फारूख अब्दुल्ला ने अंतरिम मुख्य मंत्री की शपथ ली व छठे आम चुनावों में [[जून]],[[1983]] में नेशनल कांफ्रेंस को विजय मिली।
 
* '''1984''' : इस वर्ष भारतीय सेना ने दुनिया के सबसे बड़े और ऊँचे [[ग्लेसियर]] और युद्द के मैदान ([[सियाचीन]]) को अपने कब्जे में कर लिया। इस समय भारतीय सेना को ऐसी खबर मिली थी कि पाकिस्तान सियाचिन पर अधिकार कर रहा है। इस कारण भारत ने भी चढ़ाई शुरू की और पाकिस्तान से पहले वहाँ पहुंच गया। सियाचिन भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
 
* '''1987''' में कश्मीर विधानसभा के चुनाव के दौरान [[नेशनल कांफ्रेंस]] और [[भारतीय राष्त्रीय कांग्रेस]] ने मिलकर बहुत भारी गड़बड़ी की और वहाँ इन्होने चुनाव जीता। चुनाव में बहुत भारी संख्या में जीते जाने पर दोनों पार्टियों के विरुद्ध काफ़ी प्रदर्शन हुए और धीरे-धीरे ये प्रदर्शन आक्रामक और हिंसक हो गया। इस हिंसक प्रदर्शनों का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने इन्हीं प्रदर्शनकारियों में अपने हिज्ब उल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकवादी संगठन और जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अलगाववादियों को शामिल कर दिया। बाद में युवा कश्मीरियों को सीमा पार भेज कर उन्हें आतंकी ट्रेनिंग दी जाने लगी। इस तरह के सभी आतंकी गतिविधियों को आईएसआई और अन्य विभिन्न संगठनों का समर्थन प्राप्त था।
 
* '''कश्मीरी पंडितों का कश्मीर से विस्थापन
1990 में कश्मीरी पंडितों को बहुत अधिक विरोध और हिंसा झेलनी पड़ी। कश्मीरी पंडित कश्मीर घाटी में एक अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय है।इनके बहुत सारी धमकियां आनी शुरू हुईं और कई बड़े कश्मीरी पंडितों को सरेआम गोली मारी गयी। इन्हें दिन दहाड़े धमकियां दी जाने लगीं कि यदि इन्होने घाटी नहीं छोड़ा तो इन्हें जान से मार दिया जाएगा। लगभग 200 से 300 कश्मीरी पंडितों को 2 से 3 महीने के अन्दर मार दिया गया। इसके बाद ये धमकियाँ अखबारों में छपने लगीं कि कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ देना चाहिए साथ ही दिन रात लाउड स्पीकर से भी घोषणा करके उन्हें डराया जाने लगा। अंततः अपनी जान के डर से ये कश्मीरी पंडित जो कि लगभग 2.5 से 3 लाख की संख्या में थे, उन्हें रातोंरात घाटी छोड़ कर जम्मू या दिल्ली के लिए रवाना होना पड़ा।
 
इस घटना के पीछे एक वजह ये भी थी कि इस समय केंद्र सरकार ने जगमोहन को केंद्र का गवर्नर बनाया था। फारुक अबुद्ल्लाह ने कहा था कि यदि जगमोहन को गवर्नर बनाया गया तो, वे इस्तीफ़ा दे देंगे और इस पर फारुख ने इस्तीफ़ा दे दिया। कश्मीर में इसके बाद पूरी तरह से अव्यवस्था और अराजकता फ़ैल गयी थी।
 
;कश्मीर में कानून द्वारा सुरक्षा बलों को विशेष शक्ति (एएफ़एसपीए) दी गयी
 
इस तरह की अराजकता को देखते हुए भारत सरकार ने यहाँ पर आर्म्ड फ़ोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट लागू किया। इससे पहले कुछ उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में एएफएसपीए लागू किया जा चूका था। इस अधिनियम के अनुसार सेना को कुछ अतिरिक्त शक्तियाँ दी जातीं हैं जिसकी सहायता से वे किसी भी व्यक्ति को केवल सन्देह के आधार पर बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं; किसी पर संदेह होने से उसे गोली मार सकते है और किसी के घर की तलाशी भी बिना वारंट के ले सकते हैं। यह एक्ट इस समय कश्मीर को बचाने के लिए बहुत ज़रूरी था। इसके बाद धीरे धीरे हालात काबू में आने लगे। सन् 2004 के बाद यहाँ पर उग्रवाद समाप्त हुआ।
 
* '''2003''' में भारत और पाकिस्तान के बीच एलओसी सीजफायर अग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए जिसके तहत एलओसी पर गोलीबारी और घुसपैठ कम करने की बातें थीं।
 
== इन्हें भी देखें ==