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[[चित्र:Gandhi Kheda 1918.jpg|thumb|right|200px|गांधीजी 1916]][[महात्मा गांधी|गांधीजी]] के नेतृत्व में [[बिहार]] के [[चम्पारण]] जिले में सन् 1917 में एक [[सत्याग्रह]] हुआ।<ref>[https://hindi.theindianwire.com/चंपारण-आंदोलन-34473/ चंपारण आंदोलन] - दा इंडियन वायर</ref> इसे '''चम्पारण सत्याग्रह''' के नाम से जाना जाता है। गांधीजी के नेतृत्व में [[भारत]] में किया गया यह पहला सत्याग्रह था।
 
== पृष्ठभूमि एवं परिचय ==
हजारों भूमिहीन मजदूर एवं गरीब [[किसान]] खाद्यान के बजाय [[नील]] और अन्य नकदी फसलों की खेती करने के लिये वाध्य हो गये थे। वहाँ पर नील की खेती करने वाले किसानों पर बहुत अत्याचार हो रहा था। अंग्रेजों की ओर से खूब शोषण हो रहा था। ऊपर से कुछ बगान मालिक भी जुल्म ढा रहे थे। महात्मा गाँधी ने अप्रैल 1917 में राजकुमार शुक्ला के निमंत्रण पर बिहार के चम्पारन के नील कृषको की स्थिति का जायजा लेने वहाँ पहुँचे। उनके दर्शन के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। किसानों ने अपनी सारी समस्याएँ बताईं। उधर पुलिस भी हरकत में आ गई। पुलिस सुपरिटेंडंट ने गांधीजी को जिला छोड़ने का आदेश दिया। गांधीजी ने आदेश मानने से इंकार कर दिया। अगले दिन गांधीजी को कोर्ट में हाजिर होना था। हजारों किसानों की भीड़ कोर्ट के बाहर जमा थी। गांधीजी के समर्थन में नारे लगाये जा रहे थे। हालात की गंभीरता को देखते हुए मेजिस्ट्रेट ने बिना जमानत के गांधीजी को छोड़ने का आदेश दिया। लेकिन गांधीजी ने कानून के अनुसार सजा की माँग की। [[चित्र:Dr Rajendra Pd. DR.Anugrah Narayan Sinha.jpg|right|thumb|300px|चंपारन सत्याग्रह में डॉ राजेन्द्र प्रसाद एवं डॉ अनुग्रह नारायण सिंह]]
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