"संत मत": अवतरणों में अंतर

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== व्युत्पत्ति ==
 
'संत मत' का अर्थ है - 'संतों का मार्ग', 'सत्य का मार्ग', 'सही और आशावादी पथ' या 'संतों की राय'. 'संत' शब्द संस्कृत की धातु 'सद्' से बना है और कई प्रकार से प्रयोग हआ है (सत्य, वास्तविक, ईमानदार, सही). इसका मूल अर्थ है 'सत्य जानने वाला' या 'जिसने अंतिम सत्य अनुभव कर लिया हो। ' 'संत' शब्द से अर्थ आम तौर पर एक अच्छे व्यक्ति से लिया जाता है लेकिन इसका विशेष अर्थ मध्यकालीन भारत के संत कवियों से ही लिया जाता है।<ref name="शोमर">शोमर, करीने, ''संत मत:स्टडीज़ इन ए डिवोशनल ट्रेडीशंस ऑफ इंडिया'' में ''द संत ट्रेडीशन इन पर्सपेक्टिव'', शोमर के. और मैक ल्योड डब्ल्यू.एच.
 
== संत ==
 
संत मत आंदोलन एकरूप नहीं था और इसमें संतों का अपना सामाजिक-धार्मिक व्यवहार शामिल था जो कि हजार वर्ष पहले [[भगवद्गीता]] में वर्णित [[भक्ति]] पर आधारित था।<ref name="लिप्नर">लिप्नर, जूलियस जे. ''हिंदूज़: देयर रिलीजियस बिलीफ्स एंड प्रैक्टिसिस'' (1994). राऊटलेज (यूनीइटिड किंग्डम), पृ. 120-1 . ISBN 0-415-05181-9</ref> उनकी अपनी साझी कुछ रूढ़ियाँ आपस में और उन परंपराओं के अनुयायिओं में भी साझी थीं जिन्हें उन्होंने चुनौती दी थी। इस प्रकार संत मत विशिष्ट धार्मिक परंपरा के बजाय आध्यात्मिक व्यक्तित्वों का ऐसा विविधतापूर्ण समूह प्रतीत होता है जो एक सामान्य आध्यात्मिक मूल को स्वीकार करता है।<ref>गोल्ड, डेनियल, ''क्लैन एंड लाइनेज अमंग द संत्स: सीड, सब्स्टांस, सर्विस'', in ''संत मत:स्टडीज़ इन डिवोशनल ट्रेडीशन आफ़ इंडिया'' in शोमर के. और मैक्ल्योड डब्ल्यू.एच. (Eds.). पृ.305, ISBN 0-9612208-0-5</ref>
 
इस आंदोलन की सीमाएँ संभवत: संप्रदायवादी नहीं थीं और इसमें जाति और पूजा-पद्धति की [[ब्राह्मण]] अवधारणाएँ भी नहीं थीं। संत कवियों ने अपनी वाणी बोलचाल की भाषा में लिखे काव्य में कही जो उन्होंने हिंदी और मराठी जैसी स्थानीय भाषाओं में सामान्य जन को संबोधित की। उन्होंने ईश्वर नाम को सच्चा रक्षक कहा और धार्मिक आडंबरों को मूल्यहीन कह कर खारिज कर दिया। उन्होंने इस विचार को स्थापित किया कि धर्म, ईश्वर के प्रति समर्पण का विषय है जो कि हृदय में बसता है।"<ref name="लिप्नर"/>.
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