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सतनाम जाति नही बल्कि धर्म है जिसका प्रतिपादन गुरु घासीदास जी ने किया इस धर्म मे कई प्रकार की जातियां सम्मिलित हुई थी और वो सतनामी कहलाये ।इसलिए इसे जाति कहना या लिखना सतनाम धर्म के लाखों करोड़ों मानने वालों का अपमान होगा।
(सतनाम जाति नही बल्कि धर्म है जिसका प्रतिपादन गुरु घासीदास जी ने किया इस धर्म मे कई प्रकार की जातियां सम्मिलित हुई थी और वो सतनामी कहलाये ।इसलिए इसे जाति कहना या लिखना सतनाम धर्म के लाखों करोड़ों मानने वालों का अपमान होगा।)
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'''पंथी गीत'''<ref>{{वेब सन्दर्भ|title=छत्तीसगढ़ के लोकगीत और लोकनृत्य|url=http://www.ignca.nic.in/coilnet/chgr0042.htm|website=ignca.nic.in|accessdate=3 अक्टूबर 2015}}</ref> और इस गीत के साथ किया जाने वाला '''पंथी नृत्य''' छत्तीसगढ़ में के सतनामीसतनाम जातिधर्म के लोगो के द्वारा ईश्वर (सतनाम पिता) की स्तुति में और संत गुरूघासीगुरूघासीदास बाबा के जीवन चरित्र एवं उनके उपदेशों का वर्णन करने हेतु किया जाता है।पंजाब में जो स्थान गुरु नानक देव जी का है छत्तीसगढ़ में वही स्थान गुरु घासीदास जी का है इन्होंने महान तप करके सत्य को पाया और उसे ही मनुष्य एवं जीवन का आधार माना जीवन की मूल भूत इकाइयों को जाना और इसे जन मानस तक पहुचाया। सत्य की खोज करने के कारण ही धर्म का नाम सतनाम अर्थात सत्यनाम पड़ा । पंथी नृत्य सतनाम के अनुनायियों अर्थात सतनामियों के द्वारा किया जाने वाला नृत्य है जिसमे नृत्य करते हुए गुरु की महिमा गुरु के उपदेशों का बखान गाकर किया जाता है गुरु घासीदास दास द्वारा दिये उपदेश इस नृत्य के माध्यम से लोगो तक पहुचाये जाते है। ज्ञात हो कि गुरुघासीदास ने मूर्ति पूजा का खंडन किया इसलिए सतनाम में मूर्तिपूजा निषेध है। <ref name=upkar>{{पुस्तक सन्दर्भ|title=छत्तीसगढ़ वृहद सन्दर्भ|publisher=उपकार प्रकाशन|page=408|url=https://books.google.co.in/books?id=c5x6BwAAQBAJ&lpg=PR15&ots=GE1i-mdlnQ&dq=%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A5%E0%A5%80%20%E0%A4%A8%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF&pg=PA408#v=onepage&q=%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A5%E0%A5%80%20%E0%A4%A8%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF&f=false|accessdate=3 अक्टूबर 2015}}</ref> यह निर्गुण भक्ति धारा से प्रेरित गीत और नृत्य हैं जिसमे गुरु घासीदास के द्वारा दिए गए उपदेश को गीत और नृत्य के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत किया जाता है।नृत्य करने वालो की संख्या निश्चित नही है। इस नृत्य के नर्तक बहुत ज्यादा ऊर्जा से भरपूर होते हैं और तरह तरह की कलाबाजियां भी दिखाते हैं एवम मानव पिरामिड बनाते हैं जिससे दर्शक रोमांचित हो उठते हैं। <ref>{{समाचार सन्दर्भ|title=घासीदास जी के अमर संदेश-पंथी गीत|url=http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/1629/3/0#.Vg-Rteyqqko|accessdate=3 अक्टूबर 2015|publisher=देशबंधु|date=20 फरवरी 2010}}</ref>
 
इसके साथ प्रमुख वाद्य यंत्र के रूप में झांझ मंजीरा और मांदर तथा ढोलक का उपयोग किया जाता है। इसे छत्तीसगढ़ की खास पहचान के रूप में भी देखा जाता है।<ref>{{वेब सन्दर्भ|title=कृषि मंत्री ने किया सतनामी समाज के समाज सेवियों का सम्मान|url=http://www.dprcg.gov.in/2478-21-9-2013|website=dprcg.gov.in|publisher=छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग|accessdate=3 अक्टूबर 2015|date=21 सितंबर 2013}}</ref>
 
इस नृत्य के नर्तकों में महान स्वर्गीय देवदास बंजारे का नाम उल्लेखनीय है।<ref>{{समाचार सन्दर्भ|title=देवदास बंजारे को पुण्यतिथि पर किया याद|url=http://www.bhaskar.com/news/CHH-RAI-HMU-MAT-latest-raipur-news-030523-2523433-NOR.html|accessdate=3 अक्टूबर 2015|publisher=दैनिक भास्कर|date=27 अगस्त 2015}}</ref>
 
==सन्दर्भ==
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