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[[महमूद ग़ज़नवी]] के भतीजे [[सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी]] ने 16 वर्ष की आयु में [[सिंधु नदी]] को पार कर भारत पर आक्रमण किया और [[मुल्तान]], [[दिल्ली]], [[मेरठ]] और अंत में [[सतरिख]] पर विजय प्राप्त की। सतरिख में, उन्होंने अपने मुख्यालय की स्थापना की और स्थानीय राजाओं को हराने के लिए सेनाओं को भेज दिया। सैयद सैफ-उद-दीन और मियाँ राजब को [[बहराइच]] को भेज दिया गया था। बहराइच के स्थानीय राजा और अन्य पड़ोसी हिंदू राजाओं ने एक संघ का गठन किया लेकिन मसूद के पिता [[सैयद सालार साहू गाजी]] के नेतृत्व में सेना ने उन्हें हरा दिया। फिर भी उन्होंने उत्पात मचाना जारी रखा और इसलिए सन् 1033 में मसूद खुद बहराइच में उनकी प्रगति को जाँचने आया। सुहेलदेव के आगमन तक, मसूद ने अपने दुश्मनों को हर बार हराया। अंत में सन् 1034 में सुहेलदेव की सेना ने मसूद की सेना को एक लड़ाई में हराया और मसूद की मौत हो गई।
 
9वीं सदी में बहराइच पर शासन करने वाले महाराजा त्रिलोकचंद्र अर्कवंशी ने बहराइच में एक विशाल सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। उनके द्वारा बनवाए गए इस मंदिर को बालार्क मंदिर का नाम दिया गया था। महाराजा त्रिलोकचंद्र अर्कवंशी ने ही बहराइच से अपनी सेना लेकर दिल्ली के शासक को युद्ध में हराया था जिसके बाद महाराजा त्रिलोकचंद्र अर्कवंशी ने दिल्ली पर अपना शासन स्थापित किया और इनकी 9 पीढ़ियों ने दिल्ली पर शासन किया। 14वीं सदी में इस्लामिक आक्रमणकारी तुगलक ने इस भव्य और हिंदूओं के मंदिर को तुड़वा डाला और इस हिंदू मंदिर की जगह सैय्यद सलार मसूद गाजी की दरगाह बनवा दी। इस हमलावर सैय्यद सलार मसूद गाजी को बहराइच में राज कर रहे महाराजा सुहेलदेव भारशिव ने मौत के घाट उतार दिया था। इसका वर्णन मिरात ए मसूदी में भी किया गया है। यह युद्ध सन् 1034 ई0 के आस पास लड़ा गया था जिसमें 17 हिंदू राजाओं ने संगठित होकर महाराजा सुहेलदेव भारशिव के नेतृत्व में सैय्यद सलार मसूद गाजी की इस्लामी जिहाद की 1,50,000 (डेढ़ लाख) सेना को गाजर मूली की तरह काट डाला था। आज उसी बालार्क मंदिर जिसे महाराजा त्रिलोकचंद्र अर्कवंशी ने बनवाया था उसे तोड़कर उसकी जगह इस सैय्यद सलार मसूद गाजी की दरगाह बना दी गई है।
 
== राजनीतिकरण ==