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नाटककार निस्सन्देह घटना-संयोजन में अत्यन्त दक्ष हैं। उनके वर्णन सार्थक और स्वाभाविक हैं। नाटक का प्रधान रस, वीर है। गौड़ी रीति, ओज गुण और प्रभावी भाषा-उसकी अन्य विशेषताएं हैं। [[कर्ण]] का वक्तव्य देखिये-
: ''सूतो वा सूतपुत्रो वा यो वा को वा भवाम्यहम्।
: ''दैवायतं कुले जन्मः मयायत्तंमदायत्तं तु पौरुषम्॥(वेणी. सं. 3)
: ''( मैं चाहे सूत हूँ या सूतपुत्र, अथवा कोई और। किसी कुल-विशेष में जन्म लेना यह तो दैव के अधीन है, मेरे पास जो [[पौरुष]] है उसे मैने पैदा किया है।)
 
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