"परीक्षा गुरू (हिन्दी का प्रथम उपन्यास)" के अवतरणों में अंतर

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हिंदी के प्रथम उपन्यास परीक्षा गुरु
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'''परीक्षा गुरू''' [[हिन्दी]] का प्रथम [[उपन्यास]] था जिसकी रचना [[भारतेन्दु युग]] के प्रसिद्ध नाटककार [[लाला श्रीनिवास दास]] ने 25 नवम्बर,1882 को की थी।
 
== कथानक हिंदी के प्रथम उपन्यास 'परीक्षा गुरु' ==
== कथानक ==
लाला श्रीनिवास कुशल महाजन और व्यापारी थे। अपने उपन्यास में उन्होंने मदनमोहन नामक एक रईस के पतन और फिर सुधार की कहानी सुनाई है। मदनमोहन एक समृद्ध वैश्व परिवार में पैदा होता है, पर बचपन में अच्छी शिक्षा और उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण और युवावस्था में गलत संगति में पड़कर अपनी सारी दौलत खो बैठता है। न ही उसे आदमी की ही परख है। वह अपने सच्चे हितैषी ब्रजकिशोर को अपने से दूर करके चुन्नीलाल, शंभूदयाल, बैजनाथ और पुरुषोत्तम दास जैसे कपटी, लालची, मौका परस्त, खुशामदी "दोस्तों" से अपने आपको घिरा रखता है। बहुत जल्द इनकी गलत सलाहों के चक्कर में मदनमोहन भारी कर्ज में भी डूब जाता है और कर्ज समय पर अदा न कर पाने से उसे अल्प समय के लिए कारावास भी हो जाता है।
 
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