"गाँजा" के अवतरणों में अंतर

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गाँजे के पेड़ यदि बहुत पास-पास हों तो उनमें से चरस भी बहुत ही कम निकलता है। कुछ लोगों का मत है कि चरस का चेप केवल नर पौधों से निकलता है। गरमी के दिनों में गाँजे के फूलने से पहले ही इसका संग्रह होता है। यह गाँजे के डंठलों को हावन दस्ते में कूटकर या अधिक मात्रा में निकलने के समय उस पर से खरोंचकर इकट्ठा किया जाता है। कहीं-कहीं चमड़े का पायजामा पहनकर भी गाँजे के खेतों में खूब चक्कर लगाते हैं जिससे यह चेप उसी चमड़े में लग जाता है, पीछे उसे खरोचकर उस रूप में ले आते हैं जिसमें वह बाजारों में बिकता है। ताजा चरस मोम की तरह मुलायम और चमकीले हरे रंग का होता है पर कुछ दिनों बाद वह बहुत कड़ा और मटमैले रंग का हो जाता है। कभी-कभी व्यापारी इसमें [[तीसी]] के तेल और गाँजे की पत्तियों के चूर्ण की मिलावट भी देते हैं। इसे पीते ही तुरंत नशा होता है और आँखें बहुत लाल हो जाती हैं। यह गाँजे और भाँग की अपेक्षा बहुत अधिक हानिकारक होता है और इसके अधिक व्यवहार से मस्तिष्क में विकार आ जाता है। पहले चरस मध्य एशिया से चमड़े के थैलों (या छोटे-छोटे चरसों) में भरकर आता था। इसी से उसका नाम चरस पड़ गया।
 
दुनिया का सबसे अच्छा चरस [[ मलाना क्रिम ]] के नाम से जाना जाता है। मलाना नाम के गांव मे यह चरस बनती है। यह गांव अपने आप में एक अजूबां है। यहा २०१८ में ५९३ एकर गांजा का उत्पादन हुआ था। यहा कि चरस (Ind. Currency ) [[ ११०० रू. प्रति १० ग्राम ]] के भाव से बिकती है।
 
== भाँग ==
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