"प्रह्लादपुरी मंदिर, मुल्तान" के अवतरणों में अंतर

कहा जाता है कि मंदिर उस स्थान पर स्थित है जहाँ मूल मंदिर का निर्माण प्रह्लाद ने स्वयं किया था और साथ में यह भी कहा जाता है कि यह वह स्थान है जहाँ भगवान [[नरसिंह]] ने पिता [[हिरण्यकशिपु]] से प्रह्लाद को बचाने के लिए स्तंभ के बाहर प्रकट हुए थे।<ref name=x/><ref name=y/><ref name=z>[http://www.thefridaytimes.com/15042011/page16.shtml]</ref> इसलिए, हिंदुओं का मानना है कि होली की शुरुआत इस मंदिर से हुई है।
 
मुल्तान के सूर्य मंदिर की तरह प्रह्लादपुरी मंदिर भी मुल्तान की मुस्लिम विजय के बाद नष्ट हो गया था। डॉ.ए.एन.खान का कहना है कि 1810 के दशक में मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था, जब यह क्षेत्र सिखों के शासन में था। हालांकि, 1831 में मंदिर का दौरा करने वाले अलेक्जेंडर बर्नेस ने कहा कि उन्होंने इसे बिना छत के सुनसान पाया था। भारत के विभाजन के बाद, कई हिंदू पलायन कर गए और मंदिर के मामलों को शहर के अल्पसंख्यक हिंदुओं द्वारा प्रबंधित किया गया। लेकिन भारत में बाबरी मस्जिद को गिराने के बाद पाकिस्तान में कई हिंदू मंदिरों को गिराया गया, जिनमें से एक प्रल्हादपुरी मंदिर भी था।
 
अब इस मंदिर में रखी भगवान नरसिंहा की मूर्ति हरिद्वार में है, जिसे 1947 में विभाजन के समय प्रसिद्ध वयोवृद्ध संत बाबा नारायण दास बत्रा ने मुल्तान से भारत लाया गया था।
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