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ग्राम पंचायत पंसेरी
(पल्ली लोहवट जोधपुर राजस्थान भारत)
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(ग्राम पंचायत पंसेरी)
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[[भारत]] की [[पंचायती राज]] प्रणाली में [[गाँव]] या छोटे कस्बे के स्तर पर '''ग्राम पंचायत''' या '''ग्राम सभा''' होती है जो भारत के स्थानीय स्वशासन का प्रमुख अवयव है। सरपंच, ग्राम सभा का चुना हुआ सर्वोच्च प्रतिनिधि होता है। प्राचीन काल से ही [[भारत|भारतवर्ष]] के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में '''पंचायत''' का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सार्वजनिक जीवन का प्रत्येक पहलू इसी के द्वारा संचालित होता था।
 
== दिनेश राणा ==
== परिचय एवं इतिहास ==
ग्राम पंचायत
 
=== प्राचीन काल ===
[[वैदिक काल]] में भी पंचायतों का अस्तित्व था। ग्राम के प्रमुख को '''ग्रामणी''' कहते थे। [[उत्तर वैदिक काल]] में भी यह होता था जिसके माध्यम से राजा ग्राम पर शासन करता था। [[महात्मा बुद्ध|बौद्धकालीन]] ग्रामपरिषद् में "ग्राम वृद्ध" सम्मिलित होते थे। इनके प्रमुख को "ग्रामभोजक" कहते थे। परिषद् अथवा पंचायत ग्राम की भूमि की व्यवस्था करती थी तथा ग्राम में शांति और सुरक्षा बनाए रखने में ग्रामभोजक की सहायता करती थी। [[जनहित]] के अन्य कार्यों का संपादन भी वही करती थी। स्मृति ग्रंथों में भी पंचायत का उल्लेख है। [[कौटिल्य]] ने ग्राम को राजनीतिक इकाई माना है। "[[अर्थशास्त्र (ग्रन्थ)|अर्थशास्त्र]]" का "ग्रामिक" ग्राम का प्रमुख होता था जिसे कितने ही अधिकार प्राप्त थे। अपने सार्वजनिक कर्तव्यों को पूरा करने में वह ग्रामवासियों की सहायता लेता था। सार्वजनिक हित के अन्य कार्यों में भी ग्रामवासियों का सहयोग वांछनीय था। ग्राम की एक सार्वजनिक निधि भी होती थी जिसमें जुर्माने, दंड आदि से धन आता था। इस प्रकार ग्रामिक और ग्रामपंचायत के अधिकार और कर्तव्य सम्मिलित थे जिनकी अवहेलना दंडनीय थी। [[गुप्तकाल]] में ग्राम शासन की सबसे छोटी इकाई था जिसके प्रमुख को "ग्रामिक" कहते थे। वह "पंचमंडल" अथवा पंचायत की सहायता से ग्राम का शासन चलाता था। "ग्रामवृद्ध" इस पंचायत के सदस्य होते थे। [[हर्ष]] ने भी इसी व्यवस्था को अपनाया। उसके समय में राज्य "भुक्ति" (प्रांत), "विषय" (जिला) और "ग्राम" में विभक्त था। [[हर्ष]] के [[मधुबन शिलालेख]] में सामकुंडका ग्राम का उल्लेख है जो "कुंडघानी" विषय और "[[अहिछत्र]]" भुक्ति के अंतर्गत था। ग्रामप्रमुख को ग्रामिक कहते थे।
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