"चुटकुला" के अवतरणों में अंतर

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== चुटकुलों पर हंसी क्यों आती है ==
मनोवैज्ञानिकों और साहित्य पर अनुसन्धान करने वालों ने इस प्रश्न पर काफी गहराई से अध्ययन किया है के चुटकुलों पर लोग बेबसी से हँसते क्यों हैं। इस विषय को लेकर बहुत से सूक्ष्म प्रश्न सामने आते हैं, जैसे कि ऐसा क्यों है के एक ही चुटकुला जब एक आदमी सुनाये तो लोग हँसते हैं लेकिन दूसरा सुनाये तो नहीं हँसते? यह माना जाता है के कई चुटकुलों में तनाव के उतार-चढ़ाव का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। जैसे कि एक चुटकुला है कि -
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:"दो पागल पागलख़ाने से फ़रार हो गए। पुलिस उन्हें ढूँढती-ढूँढती थक गयी, तब कहीं जा कर उनमे से एक हाथ आया।
:पुलिसवाले ने उस से पूछा - "भई, तेरा साथी कहाँ है?"
:उसने कहा - "दरअसल वो भागा था, मैं तो उसे वापस लाने उसके पीछे भागा था।"
:पुलीसवाले ने कहा - "अरे! तू तो बिलकुल पागल नहीं लगता। हम पागलख़ाने से बात कर के तुझे रिहा करवा लेंगे। अच्छा, तो बता वो गया कहाँ? निकलते ही भाग गया क्या?"
:पागल ने कहा - "नहीं, नदी में गीला हो गया था न, इसलिए मैंने उसे सूखने के लिए लटका दिया।"
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:"'''स्टोरकीपर'''- चीनी यहाँ नहीं मिलती ? '''सरदार'''- हम पागल नहीं हैं, पढ़ें लिखे हैं,दवा पर लिखा है शुगर फ्री (Sugar free) चीनी तो तुम्हारा बाप भी देगा हाँ"
 
इस लतीफ़े में शुरू में पागलों के भाग उठने से तनाव पैदा होता है। और फिर लगता है के यह तो पागल है ही नहीं, इसलिए तनाव कम होता है लेकिन थोड़ा सा शक़ बना रहता है। और फिर एकदम से तनाव फिर से भड़क उठता है। किसी भी लतीफ़े में यह ज़रूरी है के तनाव का यह उतार-चढ़ाव आकस्मिक लगे, यानि जहां तनाव बढ़ने कि उम्मीद हो वहाँ उल्टा घट जाए और जहां घटने कि संभावना लगे वहां उल्टा बढ़ जाए। अच्छे चुटकुला सुनाने वाले इस तनाव के बहाव को अपने नियंत्रण में रखते हैं। कुछ लतीफ़ों में तनाव का इतना उतार-चढ़ाव नहीं होता लेकिन उनमें भी उम्मीद से कुछ विपरीत होता है जो व्यंग्यपूर्ण ढंग से चौंका जाए।
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