"तेलुगू भाषा" के अवतरणों में अंतर

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भाषा, language
(भाषा, language)
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{{मुख्य|तेलुगु लिपि}}
 
प्राय: सभी ध्वनियों के लिये लिपिचिह्न इस भाषा में पाए जाते हैं। इसकी विशेषता यह है कि ह्रस्व ए, ओ, दंत्य च, ज़ एवं शकट रेफ नाम से एक अधिक "र" के अतिरिक्त अर्धबिंदु और "ळ" भी इस भाषा में है। इस तरह संस्कृत वर्णमाला की अपेक्षा तेलुगु वर्णमाला में छह अक्षर अधिक पाए जाते हैं। प्राय: संस्कृत के मंगल, ताल और कला आदि शब्दों के "ल" वर्ण तेलुगु में "ळ" से उच्चरित होते हैं। अर्धानुस्वार का अस्तित्व उच्चारण में नहीं है लेकिन भाषा का क्रमविकस जानने के लिय इसके लिखने की अवश्यकता है। कुछ शब्द एक ही प्रकार से उच्चरित होते हुए भी अर्धानुस्वार के समावेश से भिन्न-भिन्न अर्थ देते है। उदाहरणत: "एडु" का अर्थ सात संख्या है। उसी को अर्धानुसार से 'एँडु' शब्द लिखा जाए तो इसका अर्थध्यानअर्थ वर्ष अर्थात् संवत्सर होता है। तेलुगु स्वरांत याने "अजंत" भाषा है जबकि [[हिंदी]] "व्यंजनांत" या "हलंत भाषा"। स्वरांत भाषा होने के कारण तेलुगु [[संगीत]] के लिये अत्यंत उपयुक्त मानी गई है। अत: [[कर्नाटक संगीत]] में 90 प्रतिशत शब्द तेलुगु के पाए जाते हैं।
 
तेलुगु लिपि मोतियों की माला के समान सुंदर प्रतीत होती है। अक्षर गोल होते हैं। तेलुगु और [[कन्नड लिपि|कन्नड लिपियों]] में बड़ा ही सादृश्य है। ईसा के आरंभकाल की "ब्राह्मी लिपि" ही आंध्र-कर्नाटक लिपि में परिवर्तित हुई। इस लिपि का प्रचार "सालंकायन" राजाओं के समय सुदूर देशों में भी हुआ। तमिलों ने सातवीं शताब्दी में अपनी अलग लिपि बना ली।
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