"मकर संक्रान्ति" के अवतरणों में अंतर

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सम्पूर्ण भारत में मकर संक्रान्ति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रान्तों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं।
 
'''[[हरियाणा]] और [[पंजाब (भारत)|पंजाब]]''' में इसे [[लोहड़ी]] के रूप में एक दिन पूर्व [[१३ जनवरी]] को ही मनाया जाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए [[तिल]], [[गुड़]], [[चावल]] और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग [[मूंगफली]], तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियाँरेवड़ियां आपस में बाँटकर खुशियाँ मनाते हैं। बेटियाँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे(बेटे) के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारम्परिक [[मक्के की रोटी]] और [[सरसों का साग|सरसों के साग]] का आनन्द भी उठाया जाता है
 
'''[[उत्तर प्रदेश]]''' में यह मुख्य रूप से '[[दान]] का पर्व' है। [[इलाहाबाद]] में [[गंगा]], [[यमुना]] व [[सरस्वती]] के [[संगम]] पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक माघ मेला लगता है जिसे [[माघ मेला|माघ मेले]] के नाम से जाना जाता है। १४ जनवरी से ही इलाहाबाद में हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है। १४ दिसम्बर से १४ जनवरी तक का समय खर मास के नाम से जाना जाता है। एक समय था जब उत्तर भारत में १४ दिसम्बर से १४ जनवरी तक पूरे एक महीने किसी भी अच्छे काम को अंजाम भी नहीं दिया जाता था। मसलन शादी-ब्याह नहीं किये जाते थे परन्तु अब समय के साथ लोगबाग बदल गये हैं। परन्तु फिर भी ऐसा विश्वास है कि १४ जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है। माघ मेले का पहला स्नान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्रि के आख़िरी स्नान तक चलता है। संक्रान्ति के दिन स्नान के बाद दान देने की भी [[परम्परा]] है।[[बागेश्वर]] में बड़ा मेला होता है। वैसे गंगा-स्नान रामेश्वर, चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी होते हैं। इस दिन [[गंगा]] स्नान करके तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है। इस पर्व पर क्षेत्र में गंगा एवं [[रामगंगा]] घाटों पर बड़े-बड़े मेले लगते है। समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को ''खिचड़ी'' के नाम से जाना जाता है तथा इस दिन [[खिचड़ी]] खाने एवं खिचड़ी दान देने का अत्यधिक महत्व होता है।
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