"पर्यावरण" के अवतरणों में अंतर

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पृथ्वी पर पैमाने (scale) के हिसाब से सबसे वृहत्तम पारितंत्र [[जैवमंडल]] को माना जाता है। जैवमंडल पृथ्वी का वह भाग है जिसमें जीवधारी पाए जाते हैं और यह स्थलमंडल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल में व्याप्त है। पूरे पार्थिव पर्यावरण की रचना भी इन्हीं इकाइयों से हुई है, अतः इन अर्थों में वैश्विक पर्यावरण, जैवमण्डल और पार्थिव पारितंत्र एक दूसरे के समानार्थी हो जाते हैं।
 
माना जाता है कि पृथ्वी के वायुमण्डल का वर्तमान संघटन और इसमें ऑक्सीजन की वर्तमान मात्रा पृथ्वी पर जीवन होने का कारण ही नहीं अपितु परिणाम भी है। प्रकाश-संश्लेषण, जो एक जैविक (या पारिस्थितिकीय अथवा जैवमण्डलीय) प्रक्रिया है, पृथ्वी के वायुमण्डल के गठन को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया रही है। इस प्रकार के चिंतन से जुड़ी विचारधारा पूरी पृथ्वी को एक इकाई ''[[गाया संकल्पना|गाया]]गया''<ref>[http://www.oxforddictionaries.com/definition/english/Gaia गाया परिकल्पना], ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी पर (अभिगमन तिथि 05-08-2014)</ref> या सजीव पृथ्वी (living earth) के रूप में देखती है।<ref>Lovelock, J.E. (1 अगस्त 1972). "Gaia as seen through the atmosphere". Atmospheric Environment (1967) (Elsevier) 6 (8): 579–580. </ref>
 
इसी प्रकार मनुष्य के ऊपर पर्यवारण के प्रभाव और मनुष्य द्वारा पर्यावरण पर डाले गये प्रभावों का अध्ययन [[मानव पारिस्थितिकी]] और [[मानव भूगोल]] का प्रमुख अध्ययन बिंदु है।<ref>Richards, Ellen H. (1907 (2012 reprint))[http://www.amazon.com/Sanitation-Daily-Life-Classic-Reprint/dp/B008KX8KGA#reader_B008KX8KGA Sanitation in Daily Life], Forgotten Books. pp. v.</ref><ref>आर॰ डी॰ दीक्षित, [http://books.google.co.in/books?id=UfDTzGHjWLwC&lpg=PA253&ots=fxaJ8z8Kf_&dq=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B5%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%80&pg=PA253#v=onepage&q=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B5%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%80&f=false भौगोलिक चिंतन का विकास] पृष्ठ सं॰ 253, गूगल पुस्तक (अभिगमन तिथि 25-07-2014)</ref><ref>हार्लेन एच॰ बैरोज, (1923), ''Geography as Human Ecology'', Annals of the Association of American Geographers, 13(1):1-14</ref>
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