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<ref>{{Cite web|url=http://www.livehistoryindia.com/photo-essays/2018/07/03/the-twin-forts-of-palamau|title=The Twin Forts of Palamu|website=livehistoryindia.com|}}</ref><ref>{{Cite web|url=https://m.telegraphindia.com/states/jharkhand/history-rebuild-brick-by-brick-rs-56-lakh-restoration-plan-for-crumbling-palamau-fort/cid/825676|title=History rebuild, brick by brick - Rs 56-lakh restoration plan for crumbling Palamau Fort|website=telegraphindia.com|}}</ref>
 
उसने डोइसा में छोटानागपुर के नागवंशी महाराजा [[रघुनाथ शाह]] को हराया और अपने इनाम के साथ, उन्होंने आधुनिक सतबरवा के पास [[पलामू के दुर्ग]] में से एक किला का निर्माण कराया।<ref>{{cite web|url=http://palamu.nic.in/mediniray.htm|title=Medini Ray (1662-1674) |accessdate=November 21, 2014 |deadurlurl-status=yesdead |archiveurl=https://web.archive.org/web/20100827172010/http://palamu.nic.in/mediniray.htm |archivedate=August 27, 2010 }}</ref>
 
[[औरंगज़ेब]] के बिहार के दीवानी भम्भालने पर दाउद खान ने १६६० में पलामू के खिलाफ अभियान शुरू किया था। उसके साथ दरभंगा के फौजदार मिर्जा खान, चैनपुर के जागीरदार, मुन्गेर के राजा बहरोज, कोकर के नागबंशी शासक भी थे। सम्राट औरंगजेब से आदेश प्राप्त हुए कि चेरो शासक को इस्लाम धर्म ग्रहण करना था। युद्ध में, मेदिनी रय जंगल में भाग गए। दोनों किलों पर आक्रमणकारियों द्वारा कब्जा कर लिया गया और इस क्षेत्र को अधीनता में लाया गया था। चेरो राजधानी की हिंदू आबादी हटा दिया गया और उनकी मूर्तियों के साथ मंदिरों को नष्ट कर दिया गया। पलामू के शासक मेदिनी राय, दाउद खान द्वारा अपनी हार के बाद सरगुजा भाग गए थे। एक बार फिर उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और पलामू पर अधिकार कर लिया। उन्होंने कृषि को बढ़ावा देने के लिए और पलामू के उजाड़ राज्य को बेहतर बनाने के लिए गंभीर प्रयास किए, जो बार-बार मुगल आक्रमणों के कारण हुआ था। क्षेत्र बहुत समृद्ध हो गया और लोगों के पास भोजन और जीवन की अन्य सुविधाएं थीं।<ref>{{Cite web|url=http://www.bl.uk/onlinegallery/onlineex/apac/other/019wdz000000311u00020000.html|title=Palamow New Fort from the Old. Decr. 1813|website=bl.uk/onlinegallery|}}</ref><ref>{{cite web|url=https://archive.org/stream/in.ernet.dli.2015.119550/2015.119550.The-Nagbanshis-And-The-Cheros_djvu.txt|title=The Nagbanshis And The Cheros|website=archive.org}}</ref>